05 October 2010

आचार्य महाप्रज्ञ जी की कविताये

वर्तमान उज्ज्वल करना है

विस्मृत कर दो कुछ अतीत को, दूर कल्पना को भी छोड़ो
सोचो दो क्षण गहराई से, आज हमें अब क्या करना है

वर्तमान की उज्ज्वलता से भूत चमकता भावी बनता
इसीलिए सह-घोष यही हो, ‘वर्तमान उज्ज्वल करना है’

हमने जो गौरव पाया वह अनुशासन से ही पाया है
जीवन को अनुशासित रखकर, वर्तमान उज्ज्वल करना है

अनुशासन का संजीवन यह, दृढ़-संचित विश्वास रहा है
आज आपसी विश्वासों से, वर्तमान उज्ज्वल करना है

क्षेत्र-काल को द्रव्य भाव को समझ चले वह चल सकता है
सिर्फ बदल परिवर्तनीय को, वर्तमान उज्ज्वल करना है

अपनी भूलों के दर्शन स्वीकृति परिमार्जन में जो क्षम है
वह जीवित, जीवित रह कर ही, वर्तमान उज्ज्वल करना है

औरों के गुण-दर्शन स्वीकृति अपनाने में जो तत्पर है
वह जीवित, जीवित रह कर ही, वर्तमान उज्ज्वल करना है

दर्शक दर्शक ही रह जाते, हम उत्सव का स्पर्श करेंगे
परम साध्य की परम सिध्दि यह, वर्तमान उज्ज्वल करना है


कविता की क्या परिभाषा दूँ

कविता की क्या परिभाषा दूँ
कविता है मेरा आधार
भावों को जब-जब खाता हूँ
तब लेता हूँ एक डकार
वही स्वयं कविता बन जाती
साध्य स्वयं बनता साकार

उसके शिर पग रख चलता हूँ
तब बहती है रस की धार
अनुचरी बन वह चलती है
कभी न बनती शिर का भार

अनुचरी है नहीं सहचरी
कभी-कभी करता हूँ प्यार
थक जाता हूँ चिंतन से तब
जुड़ जाता है उससे तार

प्रासाद का सिर झुक गया है

झोंपड़ी के सामने प्रासाद का सिर झुक गया है
झोंपड़ी के द्वार पर अब सूर्य का रथ रुक गया है

राजपथ संकीर्ण है, पगडंडियां उन्मुक्त हैं
अर्ध पूर्ण विराम क्यों जब वाक्य ये संयुक्त हैं
शब्द से जो कह न पाया मौन रहकर कह गया है

कौन मुझको दे रहा व्यवधान मेरे भ्रात से ही
दे रहा है कौन रवि को अब निमंत्रण रात से ही
शून्य में सरिता बहाकर पवन नभ को ढग गया है

श्रमिक से श्रमबिन्दु में निर्माण बिम्बित हो रहा है
बिन्दु की गहराइयों में सिन्धु जैसे खो रहा है
उलझती शब्दावली में सुलझता चिन्तन गया है