05 June 2018

श्रावक तीन मनोरथों का चिंतन करे : आचार्यश्री महाश्रमण


  • राष्ट्रीय राजमार्ग 16 पर गतिमान हैं राष्ट्रीय महासंत आचार्यश्री महाश्रमण
  • लगभग 13 कि.मी. का विहार कर आचार्यश्री पहुंचे माटूर
  • संसार में रहते हुए भी अनासक्तिपूर्ण जीवन जीने की दी पावन प्रेरणा



आचार्यश्री महाश्रमणजी
     05.06.2018 माटूर, गुन्टूर (आंध्रप्रदेश), (JTN) : भारत की हृदयस्थली कहे जाने वाली नई दिल्ली के लालकीले से प्रारम्भ हुई जनकल्याणकारी अहिंसा यात्रा अब तक भारत के देश के तेरह राज्यों सहित दो विदेशी धरती नेपाल और भूटान की ऐतिहासिक यात्रा परिसम्पन्न कर नवीन इतिहास की संरचना को दक्षिण भारत में गतिमान हो चुकी है। अपने प्रणेता, शांतिदूत, महातपस्वी, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के साथ अहिंसा यात्रा वर्तमान में आंध्रप्रदेश की जनता को अपने उद्देश्यों से लाभान्वित करा रही है।

      स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के तहत भारत के चारों महानगरों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए बने राष्ट्रीय राजमार्ग लोगों के सुलभ आवागमन का अब महत्त्वपूर्ण साधन हो चुके हैं। इन्हीं राष्ट्रीय राजमार्गों में से एक राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-16 महान राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी की अहिंसा यात्रा का मार्ग बना कर अपने सौभाग्य पर इतरा रहा है। आचार्यश्री की वर्तमान की प्रायः यात्रा इसी राजमार्ग पर हो रही है।

      मंगलवार को आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ चिलाकलुरीपेट स्थित श्री निवास डीएड कॉलेज परिसर से प्रातः की मंगल बेला में प्रस्थान किया और राजमार्ग पर लगभग तेरह किलोमीटर की पदयात्रा कर माटूर स्थित विवेकानंद नेक्स्ट जेनरेशन इंग्लिश स्कूल में पधारे।

      आचार्यश्री विद्यालय परिसर में बने प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को परिग्रह में बहुत ज्यादा आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। श्रावक को अपने जीविकोपार्जन में भी धार्मिकता रखने का प्रयास करना चाहिए। धनार्जन करने में नैतिकता और अहिंसा को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने लोगों को श्रावक के तीन मनोरथों का वर्णन करते हुए कहा कि श्रावक को भी आसक्ति के भाव से मुक्त होकर परिग्रहों के अल्पीकरण करने का प्रयास करना चाहिए। श्रावक का पहला मनोरथ है कि कब मैं परिग्रह का अल्पीकरण करूं। श्रावक का दूसरा मनोरथ है कब मैं मुण्ड हो सकूं। श्रावक का तीसरा मनोरथ अनशन, संलेखना में शरीर छूटे। इस प्रकार श्रावक इन तीन मनोरथों का चिंतन भी करे तो वह अपने जीवन का कल्याण कर सकता है।