आज्ञा, मर्यादा, आचार्य, गण और धर्म में समाहित है मर्यादा महोत्सव का सार : आचार्य महाश्रमण
161वें मर्यादा महोत्सव का दूसरा दिवस
आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के पट्टोत्सव पर आचार्यश्री ने किया श्रद्धा स्मरण
मुख्यमुनिश्री ने जनता को किया उद्बोधित
आज्ञा, मर्यादा, आचार्य, गण और धर्म में समाहित है मर्यादा महोत्सव का सार : आचार्य महाश्रमण
161वें मर्यादा महोत्सव का दूसरा दिवस
आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के पट्टोत्सव पर आचार्यश्री ने किया श्रद्धा स्मरण
मुख्यमुनिश्री ने जनता को किया उद्बोधित
भुज की धरा पर प्रारम्भ हुआ मर्यादा का महाकुम्भ ‘161वां मर्यादा महोत्सव’गुजरात का प्रथम मर्यादा महोत्सव भुज के स्मृतिवन में हुआ समायोजितसेवाकेन्द्रों पर आचार्यश्री ने की नियुक्तियां, सेवा को समर्पित रहा प्रथम दिवसचतुर्विध धर्मसंघ में बनी रहे आध्यात्मिक सेवा भावना : तेरापंथाधिशास्ता महाश्रमणअनेक कृतियां व जयतिथि पत्रक आचार्यश्री के समक्ष हुए लोकार्पित
करीब चार घंटे तक चलता रहा मर्यादा महोत्सव का कार्यक्रम
श्रद्धा, भक्ति एवं समर्पण के त्रिवेणी संगम स्वरूप तेरापंथ के महाकुंभ का
कच्छ (गुजरात) की धरा पर हुआ भव्य आग़ाज़
मर्यादा के शिखर पुरुष आचार्य श्री महाश्रमणजी के मुखारविंद से नमस्कार महामंत्रोच्चार से त्रिदिवसीय मर्यादा महोत्सव का हुआ प्रारंभ
पूज्य गुरुदेव युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आचार्य श्री भिक्षु एवं श्रीमद् जयाचार्य का स्मरण करते हुए 161 वें मर्यादा महोत्सव के प्रारम्भ की घोषणा करते हुए ऐतिहासिक मर्यादा पत्र की स्थापना की
सूर्य का प्रकाश कहूँ या चन्द्रमा की शीतलता कहूँ ,
करुणा की झील कहूँ या ज्ञान का सागर कहूँ !
कोमल की मधुरता कहूँ या शहद की मिठास कहूँ ,
तारा कहूँ या ध्रुव तारा कहूँ , निर्मल कहूँ या निर्मलता कहूँ !
मां की ममता कहूँ या पिता का प्यार कहूँ ,
भाई का कर्तव्य कहूँ या वात्सल्य का झरना कहूँ !
कोमल की मधुरता कहूँ या शहद की मिठास कहूँ !
विद्यालय कहूँ या विश्वविद्यालय कहूँ ,
आलय कहूँ या आत्म हिमालय कहूँ !
अनुकम्पा का प्रसाद कहूँ या प्रभु का आशीर्वाद कहूँ !
दिव्यता कहूँ या भव्यता कहूँ , सुंदरता कहूँ या आत्म सुंदरता कहूँ !
नम्रता कहूँ या विनम्रता कहूँ समता कहूँ या सरलता कहूँ !
नोट कहूँ या नोटों का बैंक कहूँ , कुछ कहे तो आध्यात्मिक एटीएम कहूँ !
तपस्वी कहूँ या महातपस्वी कहूँ , यशस्वी कहूँ या महायशस्वी कहूँ !
उज्ज्वलता का आकाश कहूँ या संकल्पों की बरसात कहूँ !
जल कहूँ या जल की तरंग कहूँ ,
कुछ कहूँ तो जीवन की उमंग कहूँ !
ज्योति कहूँ या ज्वाला कहूँ ,
कुछ कहूँ तो दिव्य उजाला कहूँ !
मान कहूँ या आत्म सम्मान कहूँ !
मैं तो तुलसी महाप्रज्ञ का हनुमान कहूँ
सत्य कहूँ या शाश्वत कहूँ , समझ में नहीं आता है, मैं क्या कहूँ !
अगर कुछ कहूँ तो शाश्वत ज्ञाता दृष्टा कहूँ !
पुष्प कहूँ या हृदय का हार कहूँ !
अगर कुछ कहूँ तो जगत का पालनहार कहूँ !
विशेषण कम विशेषताएं अनेक हैं, शब्द कम उपमाएं अनेक हैं !
हे महाश्रमण ! तुझे मैं क्या कहूँ ,
अगर कुछ कहूँ तो ये ही कहूँ
मेरे हृदय की सांस कहूँ ,
तुलसी , महाप्रज्ञ और तीर्थंकर
का साक्षात कहूँ !
हे नेमा नंदन, झूमर वंदन मेरे महाश्रमण तुझे प्रणाम !!!!
- हेमन्त छाजेड़
*📜 मर्यादा के शिखर पुरुष युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी के सानिध्य में तेरापंथ के महाकुंभ "160 वें मर्यादा महोत्सव" का वाशी - नवी मुम्बई में हो रहा है आयोजन*
*📿 पूज्य प्रवर द्वारा नमस्कार महामन्त्र के समुच्चारण के साथ तृतीय दिवस के कार्यक्रम का हुआ शुभारम्भ*
*🌀 पूज्य प्रवर द्वारा खड़े होकर गुरुदेव तुलसी द्वारा विरचित "भीखण जी स्वामी भारी मर्यादा बांधी संघ" में गीत का हुआ संगान*
*📜 मर्यादा के शिखर पुरुष युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी के सानिध्य में तेरापंथ के महाकुंभ "160 वें मर्यादा महोत्सव" का वाशी - नवी मुम्बई में हो रहा है आयोजन*
*📿 तृतीय दिवस का कार्यक्रम*
*🌀 समणी वृन्द द्वारा गीत संगान*
*सारी धरती पर बिछी अंशुमाला*
*मिला है पन्थ भिक्षुवाला*
• 160 वर्षों की परंपरा को साक्षात देख कर मर्यादा के महाकुंभ में अभिस्नात हुआ संपूर्ण श्रावक समाज
• 160वां मर्यादा महोत्सव : वाशी बना काशी
• द्वितीय दिवस के आयोजन की मनमोहक तस्वीरें
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