हे महाश्रमण ! मैं तुझे क्या कहूँ !!!
— आचार्य श्री महाश्रमण जी के चरणों में समर्पित एक भावपूर्ण काव्य रचना
सूर्य का प्रकाश कहूँ या चन्द्रमा की शीतलता कहूँ,
करुणा की झील कहूँ या ज्ञान का सागर कहूँ !
कोमल की मधुरता कहूँ या शहद की मिठास कहूँ,
तारा कहूँ या ध्रुव तारा कहूँ, निर्मल कहूँ या निर्मलता कहूँ !
मां की ममता कहूँ या पिता का प्यार कहूँ,
भाई का कर्तव्य कहूँ या वात्सल्य का झरना कहूँ !
विद्यालय कहूँ या विश्वविद्यालय कहूँ,
आलय कहूँ या आत्म हिमालय कहूँ !
अनुकम्पा का प्रसाद कहूँ या प्रभु का आशीर्वाद कहूँ !
दिव्यता कहूँ या भव्यता कहूँ, सुंदरता कहूँ या आत्म सुंदरता कहूँ !
नम्रता कहूँ या विनम्रता कहूँ, समता कहूँ या सरलता कहूँ !
नोट कहूँ या नोटों का बैंक कहूँ, कुछ कहे तो आध्यात्मिक एटीएम कहूँ !
तपस्वी कहूँ या महातपस्वी कहूँ, यशस्वी कहूँ या महायशस्वी कहूँ !
उज्वलता का आकाश कहूँ या संकल्पों की बरसात कहूँ !
जल कहूँ या जल की तरंग कहूँ,
कुछ कहूँ तो जीवन की उमंग कहूँ !
ज्योति कहूँ या ज्वाला कहूँ,
कुछ कहूँ तो दिव्य उजाला कहूँ !
मान कहूँ या आत्म सम्मान कहूँ !
मैं तो तुलसी महाप्रज्ञ का हनुमान कहूँ
सत्य कहूँ या शाश्वत कहूँ, समझ में नहीं आता है, मैं क्या कहूँ !
अगर कुछ कहूँ तो शाश्वत ज्ञाता दृष्टा कहूँ !
पुष्प कहूँ या हृदय का हार कहूँ !
अगर कुछ कहूँ तो जगत का पालनहार कहूँ !
विशेषण कम विशेषताएं अनेक हैं, शब्द कम उपमाएं अनेक हैं !
हे महाश्रमण ! तुझे मैं क्या कहूँ,
अगर कुछ कहूँ तो ये ही कहूँ
मेरे हृदय की सांस कहूँ,
तुलसी, महाप्रज्ञ और तीर्थंकर
का साक्षात कहूँ !
हे नेमा नंदन, झूमर वंदन मेरे महाश्रमण तुझे प्रणाम !!!!