प्रज्ञापाथेय
गुरुवार, अगस्त 17, 2023

दिनचर्या को अच्छा बनाने के लिए आचार्यश्री महाश्रमण जी ने किया अभिप्रेरित


शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को तीर्थंकर समवसरण से भगवती सूत्र आगम के आधार पर उपस्थित श्रद्धालुओं को पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि भगवान महावीर से पूछा गया कि प्राणियों का जागना अच्छा या सोना? भगवान महावीर ने उत्तर प्रदान करते हुए कहा कि कुछ जीवों का सोना अच्छा और कुछ जीवों का जागना अच्छा होता है। भगवान महावीर ने इसका विस्तार प्रदान करते हुए बताया गया कि जीवों को उनके कर्मों के आधार पर दो भागों में बांटे तो धार्मिक और अधार्मिक जीव प्राप्त होते हैं।

इस दृष्टिकोण से धार्मिक जीवों का जागना अच्छा होता है और अधार्मिक जीवों का सोना अच्छा होता है। अधार्मिक यदि जगेगा तो दूसरे प्राणियों को कष्ट देगा, प्रताड़ित करेगा, किसी न किसी जीव की हत्या कर देगा, किसी को अपमानित करेगा, किसी को अनावश्यक कष्ट देगा। इससे वह अपनी आत्मा के कर्मबंध भी कर लेगा। इसलिए ऐसे अधार्मिक जीव का सोना अच्छा होता है। उसके सोने से कितने-कितने जीव कष्ट पाने से बच सकते हैं, कितने जीवों की प्राणों की रक्षा हो सकती है और कितने जीव शांति से जी सकते हैं।

दूसरी ओर धार्मिक जीव के जागरण से दुःखी जीवों की सेवा हो सकती है, कितने परेशान जीवों को परेशानी से बचा सकता है, कितनी की आत्मा के कल्याण का प्रयास करेगा, कितने जीवों को धार्मिकता के मार्ग पर लाएगा। इस प्रकार कितने जीवों का कल्याण हो सकता है। इसलिए धार्मिक जीव का जागना बहुत अच्छा हो सकता है।

प्राणी के तीन प्रकार भी किए जा सकते हैं, अधार्मिक कार्यों में संलग्न रहने वाला अधम का सोना अच्छा होता है। इससे प्राणी कष्ट, हत्या, प्रताड़ना आदि से बच जाते हैं और उसकी आत्मा भी कर्म बंधनों से बच सकती है। मध्यम श्रेणी के प्राणियों का सोना-जगना दोनों ही ठीक होता है। वे न तो पाप कर्म करते और न ही ज्यादा धार्मिक कार्य करते हैं। उत्तम श्रेणी के लोगों का सतत जागृत अवस्था में बने रहना लाभकारी हो सकता है। आदमी को अपने सोने और जागने के समय का निर्धारण करने का प्रयास करना चाहिए। इससे दिनचर्या अच्छी हो सकती है तो आदमी अपने जीवन में अच्छा विकास भी कर सकता है।

आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त कालूयशोविलास का सरसशैली में आख्यान किया। आचार्यश्री के आख्यान का श्रवण कर जनता भावविभोर नजर आ रही थी।

बुधवार, अगस्त 16, 2023

अपनी आत्मा को हल्का बनाने का प्रयास करना चाहिए - अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण

16.08.2023, बुधवार, घोड़बंदर रोड, मुम्बई (महाराष्ट्र), भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई को आध्यात्मिक रूप से सम्पन्न बनाने के लिए अपनी धवल सेना के साथ मुम्बई में चतुर्मास प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी प्रतिदिन आगमवाणी के माध्यम से अध्यात्मक की गंगा प्रवाहित कर रहे हैं। सागर तट पर प्रवाहित होने वाली यह निर्मल ज्ञानगंगा जन-जन के मानस के संताप का हरण करने वाली है। इस ज्ञानगंगा में डुबकी लगाने के लिए मुम्बईवासी ही नहीं, देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। 


महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में तपस्याओं की अनुपम भेंट भी श्रद्धालुओं ने इस प्रकार चढ़ाई हैं, जिसने तेरापंथ धर्मसंघ में एक नवीन कीर्तिमान का सृजन कर दिया है। इसके अतिरिक्त अनेकों प्रकार की तपस्याओं में रत श्रद्धालु अपने आराध्य से नियमित रूप से तपस्याओं का प्रत्याख्यान कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। 


युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को तीर्थंकर समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को भगवती सूत्र आगम के माध्यम से ज्ञानगंगा को प्रवाहित करते हुए कहा कि भगवान महावीर की मंगल देशना के बाद श्रमणोपासिका जयंती उनके पास पहुंचती है और प्रश्न करती है कि जीवों की आत्मा किन कर्मों से भारी बनती है? भगवान महावीर ने उत्तर प्रदान करते हुए 18 चीजों को वर्णित किया, जिसके कारण जीव की आत्मा कर्मों का बंध कर भारी हो जाती है और अधोगामी बन जाती है। 18 चीजें अर्थात् अठारह पापों के कारण जीव की आत्मा गुरुता को प्राप्त करती है और पापकर्मों से भारी बनी आत्मा अधोगति की ओर जाती है। पापों से भारी आत्मा अधोगति और हल्की आत्मा ऊर्ध्वारोहण करती है। इसलिए आदमी को इन पापों से विमरण करते हुए अपनी आत्मा को हल्का बनाने का प्रयास करना चाहिए। आत्मा जितनी हल्की होगी, उतनी अच्छी सुगति की प्राप्ति हो सकती है। साधु तो सर्व सावद्य योगों का त्याग करने वाले होेते हैं, किन्तु श्रमणोपासक और श्रमणोपासिका बारहव्रत, संयम, नियम आदि का स्वीकरण के द्वारा भी अपनी आत्मा को पापों के भार से बचाने का प्रयास कर सकते हैं। गृहस्थावस्था में पूर्ण विरमण भले न हो पाए, किन्तु आत्मा जितनी हल्की होगी, उतनी ही अच्छी बात हो सकती है। कई बार त्याग-तपस्या, नियम, व्रत व संयम के द्वारा श्रमणोपासक भी एक ही जन्म के बाद मोक्षश्री का भी वरण कर सकता है। इस प्रकार भगवान महावीर ने संयमयुक्त जीवन जीने और अपनी आत्मा को पापों से बचाने की प्रेरणा प्रदान की। 


आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त गणाधिपति आचार्यश्री तुलसी द्वारा विरचित कालूयशोविलास के आख्यान क्रम को आगे बढ़ाते हुए परम पूज्य कालूगणी के भीलवाड़ा से कष्टप्रद स्थिति में विहार करते हुए गंगापुर में चतुर्मास में पधारने और वहां सेवा में रत रहने वाले संतों को न्यारा में भेजने के प्रसंगों का सरसशैली में वर्णन किया। अपने सुगुरु की वाणी से अपने पूर्वाचार्य के इतिहास का श्रवण कर श्रद्धालुजन मंत्रमुग्ध नजर आ रहे थे। अनेक तपस्वियों को आचार्यश्री ने उनकी धारणा के अनुसार तपस्या का प्रत्याख्यान कराया। 

बुधवार, अगस्त 09, 2023

अनोखा है इंसानी जिस्म: जानिए मानव शरीर के हैरान करने वाले रहस्य

अनोखा है इंसानी जिस्म: जानिए मानव शरीर के हैरान करने वाले रहस्य

हमारा शरीर किसी चमत्कारी सुपर-कंप्यूटर या अनूठी फैक्ट्री से कम नहीं है, आइए जानते हैं इसके बारे में कुछ दिलचस्प बातें।

इंसानी जिस्म और मानव शरीर के रहस्य

चित्र: अद्भुत क्षमताओं और जटिल तंत्रिकाओं से बना हमारा मानव शरीर।

1. जबरदस्त फेफड़े

हमारे फेफड़े हर दिन 20 लाख लीटर हवा को फिल्टर करते हैं और हमें इस बात की भनक भी नहीं लगती। यदि फेफड़ों को पूरी तरह से फैलाया या खींचा जाए, तो ये टेनिस कोर्ट के एक बड़े हिस्से को ढंक सकते हैं।

2. ऐसी और कोई फैक्ट्री नहीं

हमारा शरीर हर सेकंड 2.5 करोड़ नई कोशिकाएं बनाता है। साथ ही, हर दिन 200 अरब से ज्यादा रक्त कोशिकाओं का निर्माण करता है। हर वक्त शरीर में 2500 अरब रक्त कोशिकाएं मौजूद होती हैं। खून की मात्र एक बूंद में ही 25 करोड़ कोशिकाएं पाई जाती हैं।

3. लाखों किलोमीटर की यात्रा

इंसान का खून हर दिन शरीर में लगभग 1,92,000 किलोमीटर का सफर तय करता है। हमारे शरीर में औसतन 5.6 लीटर खून होता है, जो हर 20 सेकेंड में एक बार पूरे शरीर का चक्कर काट लेता है।

4. धड़कन, धड़कन

एक स्वस्थ इंसान का हृदय हर दिन 1,00,000 बार धड़कता है। साल भर में यह आंकड़ा 3 करोड़ से ज्यादा पार कर जाता है। दिल का पम्पिंग प्रेशर इतना तेज होता है कि वह खून को 30 फुट ऊपर तक उछाल सकता है।

5. सारे कैमरे और दूरबीनें फेल

इंसान की आंखें एक करोड़ रंगों में बारीक से बारीक अंतर आसानी से पहचान सकती हैं। फिलहाल दुनिया में ऐसी कोई आधुनिक मशीन या कैमरा नहीं है जो हमारी आंखों का मुकाबला कर सके।

💡 क्या आप जानते हैं?

  • नाक में नेचुरल एयर कंडीशनर: हमारी नाक गर्म हवा को ठंडा और ठंडी हवा को गर्म कर फेफड़ों तक पहुंचाती है।
  • 400 किमी/घंटा की रफ्तार: हमारा तंत्रिका तंत्र इतनी तेज रफ्तार से शरीर के बाकी हिस्सों तक जरूरी निर्देश और सिग्नल पहुंचाता है।
  • बेजोड़ छींक: छींकते समय बाहर निकलने वाली हवा की रफ्तार 166 से 300 किलोमीटर प्रतिघंटा हो सकती है। आंखें खोलकर छींक मारना पूरी तरह नामुमकिन है।

6. शरीर का जबरदस्त मिश्रण

हमारे शरीर में 70 फीसदी पानी होता है। इसके अलावा बड़ी मात्रा में कार्बन, जिंक, कोबाल्ट, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फेट, निकिल और सिलिकॉन जैसे तत्व मौजूद होते हैं।

7. बैक्टीरिया का गोदाम

हैरान करने वाली बात यह है कि इंसान के कुल वजन का 10 फीसदी हिस्सा शरीर में मौजूद बैक्टीरिया की वजह से होता है। हमारी त्वचा के महज एक वर्ग इंच हिस्से में ही लगभग 3.2 करोड़ बैक्टीरिया होते हैं।

8. ईएनटी (ENT) की विचित्र दुनिया

हमारी आंखें बचपन में ही पूरी तरह विकसित हो जाती हैं, बाद में उनमें कोई विकास नहीं होता। इसके विपरीत, हमारी नाक और कान पूरी जिंदगी धीरे-धीरे विकसित होते रहते हैं। हमारे कान लाखों आवाजों में अंतर पहचान सकते हैं और ये 1,000 से 50,000 हर्ट्ज के बीच की ध्वनि तरंगें सुन सकते हैं।

9. दांतों की मजबूती और मुंह की नमी

इंसान के दांत चट्टान की तरह मजबूत होते हैं, लेकिन शरीर के दूसरे हिस्सों के विपरीत दांत बीमार या टूटने पर खुद को दुरुस्त नहीं कर पाते। वहीं हमारे मुंह में हर दिन 1.7 लीटर लार बनती है, जो खाने को पचाने के साथ-साथ जीभ की 10,000 से ज्यादा स्वाद ग्रंथियों को नम रखती है।

10. नाखून, बाल और दाढ़ी की रफ्तार

हमारे हाथ के अंगूठे का नाखून सबसे धीमी रफ्तार से और मिडिल फिंगर (मध्यमा) का नाखून सबसे तेजी से बढ़ता है। पुरुषों में दाढ़ी के बाल सबसे तेजी से बढ़ते हैं; यदि कोई शख्स पूरी जिंदगी शेविंग न करे, तो दाढ़ी 30 फुट तक लंबी हो सकती है। इसके साथ ही, एक स्वस्थ इंसान के सिर से हर दिन औसतन 80 बाल स्वाभाविक रूप से झड़ते हैं।

11. खाने का अंबार और झपकती पलकें

एक आम इंसान अपनी जिंदगी के लगभग 5 साल सिर्फ खाना खाने में गुजार देता है। हम ताउम्र अपने वजन से 7,000 गुना ज्यादा भोजन खा चुके होते हैं। बात करें पलकों की, तो महिलाएं पुरुषों की तुलना में दोगुनी बार पलकें झपकती हैं, जो आंखों में नमी बनाए रखने के लिए जरूरी है।

12. सपनों की दुनिया और नींद का महत्व

इंसान दुनिया में आने से पहले ही, यानी अपनी मां के गर्भ में ही सपने देखना शुरू कर देता है। बच्चों का शारीरिक विकास वसंत ऋतु में सबसे तेजी से होता है। नींद के दौरान हमारा दिमाग अहम सूचनाओं को स्टोर करता है, शरीर की रिपेयरिंग करता है और इसी समय विकास के लिए जिम्मेदार सबसे महत्वपूर्ण हार्मोन्स रिलीज होते हैं।

स्त्रियां जब चली जाती हैं

केदार नाथ सिंह की एक सुंदर मार्मिक कविता :

*स्त्रियां जब चली जाती हैं*

स्त्रियां
अक्सर कहीं नहीं जातीं
साथ रहती हैं
पास रहती हैं
जब भी जाती हैं कहीं
तो आधी ही जाती हैं
शेष घर मे ही रहती हैं

लौटते ही
पूर्ण कर देती हैं घर
पूर्ण कर देती हैं हवा, माहौल, आसपड़ोस

स्त्रियां जब भी जाती हैं
लौट लौट आती हैं
लौट आती स्त्रियां बेहद सुखद लगती हैं
सुंदर दिखती हैं
प्रिय लगती हैं

स्त्रियां
जब चली जाती हैं दूर
जब लौट नहीं  पातीं
घर के प्रत्येक कोने में तब
चुप्पी होती है
बर्तन बाल्टियां बिस्तर चादर नहाते नहीं
मकड़ियां छतों पर लटकती  ऊंघती हैं
कान में मच्छर बजबजाते हैं
देहरी हर आने वालों के कदम सूंघती  है

स्त्रियां जब चली जाती हैं
ना लौटने के लिए
रसोई टुकुर टुकुर देखती है
फ्रिज में पड़ा दूध मक्खन घी फल सब्जियां एक दूसरे से बतियाते नहीं
वाशिंग मशीन में ठूँस कर रख दिये गए कपड़े 
गर्दन निकालते हैं बाहर
और फिर खुद ही दुबक-सिमट जाते हैँ मशीन के भीतर

स्त्रियां जब चली जाती हैं 
कि जाना ही सत्य है
तब ही बोध होता है
कि स्त्री कौन होती है
कि जरूरी क्यों होता है 
घर मे स्त्री का बने रहना

आप के जैसा दूसरा कोई नहीं

यदि आपने चाँद को देखा तो आपने ईश्वर की सुन्दरता देखी 
यदि आपने सूर्य को देखा तो आपने ईश्वर का तेज (बल) देखा
और
यदि आपने शीशा देखा तो आपने ईश्वर की सबसे सुंदर रचना को देखा
इसलिए खुद पर विश्वास रखो,
आप जैसे भी हो बेमिसाल हो आप के जैसा दूसरा कोई नहीं।

शाकाहारी और माँसाहारी में अन्तर

शाकाहारी और माँसाहारी में अन्तर

— एक शिक्षक का अद्भुत और तार्किक ज्ञान —

शाकाहार और प्रकृति

चित्र: प्रकृति, स्वास्थ्य और शाकाहार का गहरा संबंध।

मनुष्य मांसाहारी है या शाकाहारी है? विज्ञान और प्रकृति के नजरिए से समझने के लिए इस लेख को पूरा पढ़िए।

एक बार एक चिंतनशील शिक्षक ने अपने 10th स्टेंडर्ड के बच्चों से पूछा कि— "आप लोग कहीं जा रहे हैं और सामने से कोई कीड़ा-मकोड़ा, साँप, छिपकली, गाय-भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया, जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा हो, तो प्रश्न यह है कि आप कैसे पहचानेंगे कि वह जीव अंडे देता है या बच्चे? क्या पहचान है उसकी?"

अधिकांश बच्चे मौन रहे जबकि कुछ बच्चों में बस आंतरिक खुसर-फुसर चलती रही। मिनट दो मिनट बाद फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने स्वयं ही बताया कि— "बहुत आसान है! जिनके भी कान बाहर दिखाई देते हैं, वे सब बच्चे देते हैं और जिन जीवों के कान बाहर नहीं दिखाई देते हैं, वे अंडे देते हैं।"

पहला वैज्ञानिक तर्क: आँखों की बनावट

शिक्षक ने फिर दूसरा प्रश्न पूछा कि— "ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया, तो आप कैसे पहचानेंगे कि यह शाकाहारी है या मांसाहारी? क्योंकि आपने तो उसे पहले भोजन करते देखा ही नहीं।" बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर-फ़ुसर की आवाजें गूँजने लगीं।

शिक्षक ने कहा— "देखो भाई बहुत आसान है। जिन जीवों की आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल होती है, वे सब के सब माँसाहारी होते हैं, जैसे- कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील या अन्य कोई भी जीव। ठीक उसी तरह जिसकी आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए होती है, वे सब के सब जीव शाकाहारी होते हैं, जैसे- हिरन, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी इत्यादि।"

फिर शिक्षक ने पूछा— "बच्चों अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली?"
इस बार सब बच्चों ने कहा— "मनुष्य की आंखें लंबाई वाली होती हैं।"
शिक्षक ने पूछा— "तो इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी?"
सब बच्चों का एक सुर में उत्तर था— "शाकाहारी"

फिर शिक्षक ने पूछा कि बच्चों यह बताओ कि फिर मनुष्य में बहुत सारे लोग मांसाहार क्यों करते हैं? तो इस बार बच्चों ने बहुत ही गम्भीर उत्तर दिया— "अज्ञानतावश या मूर्खता के कारण।"

दूसरा वैज्ञानिक तर्क: नाखूनों की बनावट

चिंतनशील शिक्षक ने बच्चों को दूसरी बात यह बताई कि— "जिन भी जीवों के नाखून तीखे और नुकीले होते हैं, वे सब के सब माँसाहारी होते हैं, जैसे- शेर, बिल्ली, कुत्ता, बाज, गिद्ध आदि। और जिन जीवों के नाखून चौड़े और चपटे होते हैं, वे सब के सब शाकाहारी होते हैं, जैसे- गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, हिरण, बकरी इत्यादि।"

"इस हिसाब से अब ये बताओ बच्चों कि मनुष्य के नाखून तीखे-नुकीले होते हैं या चौड़े-चपटे?" बच्चों ने कहा— "चौड़े-चपटे।" शिक्षक ने पूछा— "तो मनुष्य कौन से जीवों की श्रेणी में हुआ?" सब बच्चों ने कहा— "शाकाहारी।"

प्रकृति और जीव जंतु

चित्र: प्रकृति ने हर जीव की शारीरिक संरचना उसके स्वभाव के अनुकूल बनाई है।

तीसरा वैज्ञानिक तर्क: पसीना और तापमान नियंत्रण

शिक्षक ने बच्चों को तीसरी महत्वपूर्ण बात बताई— "जिन भी जीवों अथवा पशु-प्राणियों को पसीना आता है, वे सब के सब शाकाहारी होते हैं, जैसे- घोड़ा, बैल, गाय, भैंस, खच्चर आदि। जबकि माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है; इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी जीभ निकाल कर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं और इसी प्रकार वे अपने शरीर की गर्मी को नियंत्रित (Adjust) करते हैं।"

"तो बच्चों, प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य को पसीना आता है या मनुष्य जीभ से अपने तापमान को एडजस्ट करता है?"
सभी बच्चों ने एक साथ कहा— "मनुष्य को पसीना आता है।"
शिक्षक ने मुस्कुराकर कहा— "तो इस बात से भी मनुष्य कौन सा जीव सिद्ध हुआ?" सबने कहा— "शाकाहारी।"

नैतिक और बौद्धिक ज्ञान की आवश्यकता

सभी लोग, विशेषकर अहिंसा, सनातन धर्म, संस्कृति और परंपराओं में विश्वास करने वाले, बच्चों को नैतिक-बौद्धिक ज्ञान देने के लिए बातचीत की इस शैली को विकसित कर सकते हैं। इससे बच्चे जो कुछ भी समझेंगे और सीखेंगे, वह उन्हें जीवनभर याद रहेगा और पढ़ते वक्त वे बोर भी नहीं होंगे।

एक आवश्यक सीख: बच्चे अगर बड़े हो जाएं तो उन्हें यह भी बताएं कि कैसे शाकाहारी मनुष्य जानकारी के अभाव में मांसाहार का उपयोग करता है और तर्क देता है कि जब अन्न नहीं उपजाया जाता था, तब मनुष्य मांसाहार का सेवन करते थे। यह सोचना सरासर गलत है; आदिम काल में भी मनुष्य कंद-मूल एवं फलों पर जीवित रहते थे, जो पूरी तरह सही है और मनुष्य की शारीरिक संरचना तथा स्वभाव से मेल भी खाता है।
🌿 प्रकृति की ओर लौटिये तथा ईश्वर से सच्चे अर्थों में जुड़िये 🌿

जीवित शव के समान हैं ये 14 प्राणी: जानिए मृत्यु के 14 प्रकार

जीवित शव के समान हैं ये 14 प्राणी: जानिए मृत्यु के 14 प्रकार

रामायण का एक अद्भुत प्रसंग – जब अंगद ने रावण को बताया कि कौन से लोग जीवित होकर भी मृत समान हैं


राम-रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा: "तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने से क्या फायदा?" इस पर रावण बोला: "मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे?" तब अंगद ने मुस्कुराते हुए कहा कि सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते, साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती है। इसके बाद अंगद ने रावण को नीतिशास्त्र और अध्यात्म के अनुसार मृत्यु के 14 प्रकार (जीवित शव) बताए।

कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा। अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा।।
सदारोगबस संतत क्रोधी। विष्णु विमुख श्रुति संत विरोधी।।
तनुपोषक निंदक अघखानी। जीवत शव सम चौदह प्रानी।।

जानिए जीवित शव के समान माने गए इन 14 प्राणियों के बारे में:

1. कामवश: जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नहीं करता है, सदैव वासना में लीन रहता है।

2. वाममार्गी: जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले, जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो। नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।

3. कंजूस: अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याणकारी कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो, दान करने से बचता हो, ऐसा आदमी भी मृतक समान ही है।

4. अति दरिद्र: गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वह भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ है। गरीब आदमी को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। दरिद्र-नारायण मानकर उनकी मदद करनी चाहिए।

5. विमूढ़: अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके, यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो। ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृतक समान ही है, मूढ़ अध्यात्म को नहीं समझता।

6. अजसि: जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत समान ही होता है।

7. सदा रोगवश: जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।

8. अति बूढ़ा: अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार वह स्वयं और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।

9. सतत क्रोधी: 24 घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृतक समान ही है। ऐसा व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरकगामी होता है।

10. अघ खानी: जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।

11. तनु पोषक: ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना न हो, ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकी किसी अन्य को मिलें न मिलें, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है, क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है।

12. निंदक: अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं। जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है। ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे, वह व्यक्ति भी मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।

13. परमात्म विमुख: जो व्यक्ति ईश्वर यानि परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं, हम जो करते हैं वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं, जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।

14. श्रुति संत विरोधी: जो संत, ग्रंथ, पुराणों का विरोधी है, वह भी मृत समान है। श्रुत और संत, समाज में अनाचार पर नियंत्रण (ब्रेक) का काम करते हैं। अगर गाड़ी में break न हो, तो कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को संतों की जरूरत होती है, वरना समाज में अनाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा।

निष्कर्ष: अतः मनुष्य को उपरोक्त चौदह दुर्गुणों से यथासंभव दूर रहकर स्वयं को मृतक समान जीवित रहने से बचाना चाहिए। जीवन की सार्थकता सदाचार, आत्म-अनुशासन और संयमपूर्ण जीवन में ही निहित है।

साभार : श्री सुबोध दुगड़, उदयपुर