31 December 2010

मंगल पाठ

We are pleased to inform that Acharya Shri Mahashramanji's New Year Mangal Paath will be telecast live on Sanskar Channel from 07.30 A.M. to 08.00 A.M. on 1st January 2011. On the same day on ETV Rajasthan from 12.00 Noon to 01.00 P.M. watch New year Pravachan of Acharya Shri Mahashramanji, for your information, please.

14 November 2010

कैसे बाल-दिवस मनाऊ मैं ?

गुडिया आकर बोली- अंकल! हेप्पी चिल्ड्रनस डे !
मन ठिठका, सोचा कैसे बाल-दिवस मनाऊ मैं ?
आज़ादी के तिरसठ वर्षो की यह कैसी तस्वीर ?
करोडो बच्चो के पेट में ना अन्न ना तन पर चीर.
ना जाने कितनी बच्चियां गर्भ में मार दी जाती,
जो आती संसार तो कच्ची उम्र में ब्याह दी जाती.
ना जाने हमारी कौन सी है यह मजबूरी ?
कि करवाते हम मासूमों से बाल मजदूरी.
रेस्तरां में लिखते सहसा आवाज़ लगाई आदताना,
अरे ! छोटू क्या कर रहा ? एक चाय तो लाना.
फिर अहसास हुआ यह क्या कर रहा हु मैं ?
मन ठिठका, सोचा कैसे बाल-दिवस मनाऊ मैं ?

आया ख़याल कि छोटू से पूछूं क्या तू स्कूल पढ़ेगा ?
देखो सब बढ़ रहे है आगे क्या तू नहीं बढेगा ?
लेकिन दुसरे पल ही शिक्षा पद्धति की आ गयी याद,
हजारो छात्रो की आत्महत्या कर रही जिसकी फ़रियाद.
बच्चो के वजन से उनके बस्तों का वजन है ज्यादा,
हर इक उन्हें जैसे किसी होड़ में लगाने को आमादा.
छोटू को स्कूल जाने के लिए कैसे समझा पाऊं मैं ?
मन ठिठका, सोचा कैसे बाल-दिवस मनाऊ मैं ?

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बंधुओ - बहिनों ! क्या बाल दिवस मनाना सार्थक हो सकता है जब तक कि करोडो बच्चें कुपोषण, बाल-मजदूरी, बाल-विवाह के शिकार है और जो इनसे बच गए वह शिक्षा पध्धति के शिकार है जिन्हें प्रतियोगिता और परीक्षा का भय आत्महत्या के द्वार पर लाकर खड़ा कर देता है.
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by:- Sanjay Ji Mehta

07 November 2010

About Acharya Shree Mahasraman Ji

Glorious in peace, sharp in silence, humble in learning and speciality in simplicity is the brief introduction of 36 years old Yuvacharya Shree Mahasraman previously known as Mahasraman Muni Mudit. He possesses an extraordinary genius and minute insight and intuition. Extreme gentleness and complete dedication are the important features of his singular personality. Due to extraordinary characteristics Muni Mudit leaded many old monks in the Terapanth sect and became Mahasraman at the age of 28 years. He is like a gem with broad scientific and rational outlook. In 1997 at the age of 35 years he became the "Yuvacharya" successor designate to the present Acharya, the second highest position after the Acharya himself.

This noble soul and great thinker was born in 1962 at Sardarsahar, a small town in Rajasthan. At the age of 12 years he became a monk. Under the able guidance of Acharya Tulsi and Acharya Mahaprajna, he got his education and proved himself as an ardent disciple. He possesses the qualities of a scholar, writer, brilliant speaker, meditator and impressionable personality. He also guides the youth wings of Terapanth morally and emotionally.

05 October 2010

आचार्य महाप्रज्ञ जी की कविताये

वर्तमान उज्ज्वल करना है

विस्मृत कर दो कुछ अतीत को, दूर कल्पना को भी छोड़ो
सोचो दो क्षण गहराई से, आज हमें अब क्या करना है

वर्तमान की उज्ज्वलता से भूत चमकता भावी बनता
इसीलिए सह-घोष यही हो, ‘वर्तमान उज्ज्वल करना है’

हमने जो गौरव पाया वह अनुशासन से ही पाया है
जीवन को अनुशासित रखकर, वर्तमान उज्ज्वल करना है

अनुशासन का संजीवन यह, दृढ़-संचित विश्वास रहा है
आज आपसी विश्वासों से, वर्तमान उज्ज्वल करना है

क्षेत्र-काल को द्रव्य भाव को समझ चले वह चल सकता है
सिर्फ बदल परिवर्तनीय को, वर्तमान उज्ज्वल करना है

अपनी भूलों के दर्शन स्वीकृति परिमार्जन में जो क्षम है
वह जीवित, जीवित रह कर ही, वर्तमान उज्ज्वल करना है

औरों के गुण-दर्शन स्वीकृति अपनाने में जो तत्पर है
वह जीवित, जीवित रह कर ही, वर्तमान उज्ज्वल करना है

दर्शक दर्शक ही रह जाते, हम उत्सव का स्पर्श करेंगे
परम साध्य की परम सिध्दि यह, वर्तमान उज्ज्वल करना है


कविता की क्या परिभाषा दूँ

कविता की क्या परिभाषा दूँ
कविता है मेरा आधार
भावों को जब-जब खाता हूँ
तब लेता हूँ एक डकार
वही स्वयं कविता बन जाती
साध्य स्वयं बनता साकार

उसके शिर पग रख चलता हूँ
तब बहती है रस की धार
अनुचरी बन वह चलती है
कभी न बनती शिर का भार

अनुचरी है नहीं सहचरी
कभी-कभी करता हूँ प्यार
थक जाता हूँ चिंतन से तब
जुड़ जाता है उससे तार

प्रासाद का सिर झुक गया है

झोंपड़ी के सामने प्रासाद का सिर झुक गया है
झोंपड़ी के द्वार पर अब सूर्य का रथ रुक गया है

राजपथ संकीर्ण है, पगडंडियां उन्मुक्त हैं
अर्ध पूर्ण विराम क्यों जब वाक्य ये संयुक्त हैं
शब्द से जो कह न पाया मौन रहकर कह गया है

कौन मुझको दे रहा व्यवधान मेरे भ्रात से ही
दे रहा है कौन रवि को अब निमंत्रण रात से ही
शून्य में सरिता बहाकर पवन नभ को ढग गया है

श्रमिक से श्रमबिन्दु में निर्माण बिम्बित हो रहा है
बिन्दु की गहराइयों में सिन्धु जैसे खो रहा है
उलझती शब्दावली में सुलझता चिन्तन गया है

01 October 2010

Instructions from Acharya Pavar after completion of Chaturmas

The undermentioned Singhade to Reach Ratangarh/ Rajaldesar after 3rd Jan 2011 :-

Muni Shri Sumermalji Ladnun,

Muni Shri Udit Kumarji,

Sashan Gaurav Muni Shri Tarachandji,

Muni Shri Sumti Kumarji,

Muni Shri Vijayrajji,

Muni Shri Prof Mahendra Kumarji,

Muni Shri Kamal Kumarji,

Muni Shri Darshan Kumarji,

Sadhvi Shri Sangh Mitraji,

Sadhvi Shri Vinay Shriji ( Boravad),

Sadhvi Shri Subhwatiji,

Sadhvi Shri Yashomatiji,

Sadhvi Shri Yashodharaji,

Sadhvi Shri Ujawal Kumariji,

Sadhvi Shri Suman Shriji,

Sadhvi Shri Vinay Shriji (Sri Dungargarh)”Second”,

Sadhvi Shri Chandan Balaji,

Sadhvi Shri Sainyam Shriji,

Sadhvi Shri Sainyam Prabhaji,

Sadhvi Shri Ujawal Rekhaji,

Sadhvi Shri Kamal Rekhaji,

Sadhvi Shri Raj Prabhaji,

Sadhvi Shri Rati Prabhaji,

Sadhvi Shri Labdhi Prabhaji


The Undermentioned Singhadas are to move(Vihar) towards Rajasthan:-

Sadhvi Shri Gunmalaji,

Sadhvi Shri Pramodshriji,

Sadhvi Shri Kanak Rekhaji,

Sadhvi Shri Swarnrekhaji

The Undermentioned Singhadas are to move(Vihar) towards Maharashtra :-

Sadhvi Shri Ashok Shriji,

Sadhvi Shri Kanchan Prabhaji,

Sadhvi Shri Satya Prabhaji,

Sadhvi Shri Kunthu Shriji

All Saminiji’s who are residing in India to pay a visit in the first week of Jan 2011, except those permitted by Kendra.


Terapanth Secretariat

28 September 2010

मुमुक्षु मधु दुधोडिया का भव्य दिक्षा शोभा यात्रा १६/०९/२०१०



On the occassion of Vikas Mahotsava Bahushrut Parishad was formed and it comprises of seven members, they are as follows:-

1. Terapanth Darshan Manishi Muni Shree Sumermalji 'Ladnun'

2. Muni Shree Rajkaranji

3. Agam Manishi Muni Shree Dulherajji

4. Mahashramani Sadhvi Pramukha Shree Kanak Prabhaji

5. Mukhya Niyojika Sadhvi Shree Vishrut Vibhaji

6. Sashan Gaurav Sadhvi Shree Rajimatiji

7. Sadhvi Shree Kanakshriji

06 September 2010

Paryushan Parva

Paryushan Parva is an annual religious festival of the Jains. Considered auspicious and sacred, it is observed to deepen the awareness as a physical being in conjunction with spiritual observations. Generally,Paryushan Parva falls in the month of September.

In Jainisim, fasting is considered as a spiritual activity, that purify our souls, improve morality, spiritual power, increase knowledge and strengthen relationships. The purpose is to purify our souls by staying closer to our own souls, looking at our faults and asking for forgiveness for the mistakes and taking vows to minimize our faults. Also a time when Jains will review their action towards their animals, environment and every kind of soul.

Paryashan Parva is an annual, sacred religious festivals of the Jains. It is celebrated with fasting, reading of scriptures, observing silence etc. preferably under the guidance of monks in temples. Strict fasting where one has to completely abstain from food and even water is observed for a week or more. Depending upon one's capability, complete fasting spans between 8-31 days. Religious and spiritual discourses are held where tales of Lord Mahavira are narrated. The Namokar Mantra is chanted everyday. Forgiveness in as important aspect of the celebration. At the end of Fasting, all will ask for forgiveness for any violence or wrongdoings they may have imposed previous year. The practice of forgiving transcends religious boundaries.

Digambara Jains observe it for a period of ten days during which Dashalakshana vrata is undertaken. Tatwartha Sutra of Umaswati is recited. They celebrate Ananta- Chaturdasi on the Chaturdasi. Svwetambara Jains celebrate it as an 8 day festival which ends with Bhadarpada Shukla Panchami. Kalpa Sutra is recited including the section of birth of birth of Lord Mahavira. The last day is called Samvatsari.

05 September 2010

क्षमा

क्षमा - जीवन उत्थान का मार्ग है।
क्षमा - नर से नारायण, संसारी से शिव,
क्षमा - साधक से सिद्ध, दानव से मानव,
क्षमा - खुशहाली का खजाना है।
क्षमा - ही परम सुख है।
क्षमा - ही अंतिम सत्य है।
क्षमा - वीतराग धर्म की पगडंडी है।
क्षमा - सभी गुणों का दाता है।
क्षमा - जीवन में शांति-संतोष समता प्रदाता है।
क्षमा - धारण करने से दुःख-दर्द
क्षमा - सभी भेदभाव मिटाता है।
क्षमा - मोक्ष का दरवाजा है।
क्षमा - स्नेह की सरिता है।
क्षमा - मोक्ष मार्ग की प्रथम सीढ़ी है।
क्षमा - आत्मा का आनंद है।
क्षमा - जीवन निर्माता है।
क्षमा - धर्म की जननी है।
क्षमा - में लक्ष्मी का भंडार है।
क्षमा - ही अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।

मनुष्य को मनुष्यत्व का पाठ पढ़ाता है पर्यूषण पर्व

पर्यूषण पर्व बड़े भाग्य से प्राप्त होता हैं, पर्यूषण पर्व से एक ऐसी सूझ आती है, एक ऐसी सद्बुद्धि प्राप्त होती है जिससे हम आठ दिनों तक मोह-माया से विरक्त होकर अपनी अपनी कमियों को दूर कर सकते है तथा परमात्मा की भक्ति में लीन होकर संसार की असारता को भुल जाते है, यह पर्व हमारी धार्मिक प्रवृतियों को बढ़ावा देता हैं। निष्काम भक्ति वह होती है जिसमें कोई कामना न हो अगर हमारी भक्ति में स्वर्ग की कामना है तो भक्ति निष्काम नहीं हो सकती है, वह बंध गई। पर्यूषण पर्व की साधना निष्काम भक्ति का प्रतिक होती है, पर्यूषण भावनाओं के साथ तप-जपकर भक्त भगवान को रिझाने में सफल होते हैं। आठ दिनों के इस पर्व में मनुष्य, नियम, आसन, पाणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग जैसी साधना तप-जप के साथ कर मानव जीवन को सार्थक बनाता है। यह पर्व मनुष्य को मनुष्यत्व का पाठ बढ़ाता हैं। विश्व में आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अत्याचार, अधर्म बढ़ता जा रहा है, भाई-भाई के रक्त का प्यासा बनकर संस्कृति व संस्कारों की खिल्ली उड़ा रहा है, मानवता पसीज रही है, आज विश्व को भगवान महावीर की भांति जीते-जगते महापुरुष की जरुरत है जिन्होंने ‘क्षमा विरस्य भुषणम‘ का मंत्र देकर लोगों को अहिसा का पाठ पढ़ाया था। महान पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व में भगवान महावीर के इन्हीं कथनों को चरितार्थ कर दानव भी मानव बनने की कोशिश करता है पर्यूषण पर्व के आठवे दिन सवत्सरी का प्रतिक्रमण कर जिस सहद्धया से मन के वैर को भुलाकर एक मनुष्य दुसरे मनुष्य के प्रति प्रेम का इजहार करता है हकीकत मे पर्यूषण पर्व की महानता व महावीर के संदेश का स्वरुप देखने को मिलता है। पर्यूषण पर्व की आराधना मे जो व्यक्ति लीन हो जाता है, जप-तपकी साधना से, गुरुभगवंतो की निश्रा से मनुष्य तनावों से मुक्त होकर निखर जाता है। पर्यूषण पर्व की साधना से आराधक धर्मानिष्ठ बनकर समाज व धर्म की धरोहर बन जाता है यह पर्व क्षमा, मैत्री, बंधुत्व की भावना को प्रबल कर पारस्परिक प्रेम व सद्भावना का माहोल निर्मित करता हैं।

मानव की सोई हुई अन्तर्चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को सम्बल देने पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व का आगमन होता है यह पर्व धर्म के साथ राष्ट्रीय एकता तथा मानव धर्म का पाठ पढ़ाता है यह पर्व हमे सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना अनिवार्य हैं। भगवान भक्त की भक्ति को देखता है उसकी अमीरी-गरीबी या सुख समृद्धि को नहीं भक्त अगर भगवान से प्रेम करे तो दुःख कभी आये ही नहीं इतनी सार्थक बातों का ज्ञान महान पर्यूषण पर्व देता है। जैन शासन का यह पर्व हर दृष्टीकोण से गर्व करने लायक है क्योंकि इस दरम्यान गुरु भगवंतो के मुखारविद से अमृतवाणी का श्रवण होता हैं जो हमारे जीवन में ज्ञान व धर्म के बिज बोता हैं। भौतिक संपत्ति से मानव का मन चंचल व अशांत हो जाता है। मनुष्य योनि में आकर भी जब व्यक्ति भौतिक सुखो के स्वार्थो में लिप्त रहे तो समझ लेना चाहिए उसका मानव जीवन निरर्थक व बेकार है जो मनुष्य भगवान महावीर के सिद्धांतो पर चलकर धर्म का रास्ता अख्तियार कर लेता है परमात्मा उसके हृदय रुपी मंदीर में समा जाता हैं। पर्यूषण पर्व परमात्मा को पाने का सरल मार्ग है। इसलिए इस पर्व पर दुनिया गर्व करती है और इस पर्व पर साधक साधना में रत होकर भौतिकता को त्याग कर त्याग की भावना से सराबोर हो जाता है। मन की कलुषिता को दफनाकर मैत्री-बंधुत्व की भावना से ओतप्रोत होता है क्षमा के सार को आचार और विचार बना मानव इस पर्व से पवित्र बन जाता है। पर्यूषण पर्व की मधुर बेला में प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, आस्था व धर्म की छल-छल धारा प्रवाहित होती है। साधना मे तर मनुष्य का मन शान्त, स्वच्छ, शीतल व निर्मल हो जाता है। पर्यूषण पर्व की पवित्रता से जनमन आच्छांदित होकर जगत का सम्पूर्ण कलमल मिटाने का संकल्प लेता है। वैमनस्य की भावना से मुक्त होकर व्यक्ति वैचारिक शक्तियों को प्रबल बनाकर पुरुसार्थ के कार्यों मे सलग्न हो जाता है।

सिर्फ रस्म अदायगी का नहीं, सौंदर्य को निखारने का महापर्व है क्षमापना

सही मायने में देखा जाये तो क्षमापना पर्व आज सिर्फ रस्म अदायगी बनकर रहगया है, विरले ही होंगे, जो वास्तव में क्षमा याचना करते होंगे और क्षमादान देते होंगे, वरना आम तौर पर तो क्षमापना महापर्व के दिन भी कटुता और तुच्छ अहंकार का वातावरण स्पष्ट देखा जा सकता है। यह जगत् विदित तथ्य है कि जीवन में बहुत कम पल ऐसे आते हैं, जब व्यक्ति वास्तव में सर्वांग सुन्दर लगता है। मेरा मानना है कि पूरे समर्पण भाव के साथ क्षमापना करते हुए और सारी तुच्छताओं को त्याग कर क्षमादान करने की इन दो स्थितियों में ही इंसान सबसे सुंदर लगता है। बच्चे इतने सुंदर इसीलिए होते हैं क्योंकि उनमें कोई कुटिलता और तुच्छता नहीं होती, वे बिल्कुल निर्दोष लगते है। इसीलिए वे सुंदर होते हैं, मगर हमारे मन की कुरूपता हमें सुन्दर नहीं बनने देती। एक बार समर्पित होकर क्षमापर्व को हमें मनाने की जरूरत है। बहुत कम लोग इस बात को महसूस कर पाए होंगे कि क्षमा मांगने और देने में अहंकार और तुच्छता ये दोनों बुराईयां ही बाधक हैं। हर व्यक्ति अच्छी तरह जानता है कि किसी को भी माफ कर देना या क्षमा कर देना किसी भी धर्म में सर्वोपरि तत्व है, लेकिन फिर भी हमारा अहंकार किसी से क्षमा मांगने में आड़े आ जाता है, और हमारी तुच्छता किसी को क्षमा करने में बाधक साबित होती है। जिसमें दया है, करूणा है, किसी की भावनाओं को समझने की क्षमता है और जो उदार मन वाले हैं, वे ही किसी को क्षमा कर सकते हैं। अगर हम किसी को क्षमा नहीं कर पाएं, तो मान लीजिए कि हम तुच्छ हैं। हमसे अगर कोई भूल हो जाए, तो हमारा पहला प्रयास यही रहता है कि हमें क्षमादान मिल जाए, लेकिन अगर हमें क्षमादान न मिले तो हमारी क्या स्थिति होती है। अगले की तुच्छता की वजह से कितनी मानसिक यंत्रणा से हमें गुजरना पड़ता है। ठीक इसी तरह अगर हम क्षमा मांग पाएं, तो अपने अहंकार को टटोलिए, वह हावी होताहै, तभी हम्म नहीं मांग पाते हैं। पृथ्वी लोक के किसी भी धर्म और किसी भी संप्रदाय में क्षमा को सबसे महान बताया गया है। कुरान, बाईबल, रामायण सहित जैन धर्म के समस्त ग्रंथों में क्षमादान-महादान बताया गया है। सिक्खों के दसवें गुरु गोविदसिह ने कहा था- क्षमा वही कर सकता है, जो शूरवीर हो। कायर व्यक्ति कभी किसी को क्षमा नहीं कर सकता। क्षमादान ही वीरों का आभूषण है। क्षमा वीरस्य भूषणम् वहीं से प्रचलित हुआ। कुरान में भी स्पष्ट लिखा है कि जो दूसरों को माफ कर देते हैं, अल्लाह भी उन्हें माफ कर देता है। लेकिन जो दूसरों को माफ नहीं करते, अल्लाह उनसे कैसे मोहब्बत कर पाएगा। ईसाई धर्म के प्रवर्तक यीशु मसीह तो जीवन की आखरी सांस के वक्त तक क्षमादान का परचम लहराते रहे। उन्हें जब लोग सूली पर चढ़ा रहे थे, उनके माथे, गले, हाथों और पैरों में क्रॉस पर चढ़ाकर कीलें ठोंकी जा रही थी, तब भी वे कह रहे थे-हे प्रभू इन्हें माफ कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। गीता, रामायण, महाभारत आदि हिन्दु शास्त्रों में भी क्षमादान को श्रेष्ठ दान और क्षमा याचना को श्रेष्ठ मांग माना गया है। भगवान महावीर के जियो और जीने दो सिद्धांत का क्षमा में ही निहितार्थ है। कोई भी जब तक अभय नहीं होगा, जी नहीं पाएगा। आप जानते ही हैं कि कोई भी क्षमा पाकर अभय हो जाता है। मतलब, हम क्षमादान देने के साथ ही अभयदान भी दे देते हैं। जैन धर्म ही एक ऐसा धर्ण है, जिसमें क्षमापना को पर्व के रूप में मनाया जाता है। दरअसल, इस महापर्व की सार्थकता तभी पूरी होगी, जब हम सारे ही अहंकारों का त्याग करके स्वच्छ मन से सभी को क्षमादान सहित अभयदान दें। आप सभी को संपूर्ण समर्पण के साथ मेरा मिच्छामि दुक्कड़म्। आपसे एक विनती है कि मेरी यह क्षमा याचना स्वीकारने के तत्काल बाद एक बार आप अपना चेहरा आईने में अवश्य निहारें, अपना दावा है कि आप खुद को बहुत ही सुंदर पाएंगे, इतना सुंदर कि पहले कभी नहीं देखा होगा।

कुरान, बाईबल, रामायण सहित जैन धर्म के समस्त ग्रंथों में क्षमादान-महादान बताया गया है। सिक्खों के दसवें गुरु गोविदसिह ने कहा था- क्षमा वही कर सकता है, जो शूरवीर हो। कायर व्यक्ति कभी किसी को क्षमा नहीं कर सकता। क्षमादान ही वीरों का आभूषण है। क्षमा वीरस्य भूषणम् वहीं से प्रचलित हुआ। कुरान में भी स्पष्ट लिखा है कि जो दूसरों को माफ कर देते हैं, अल्लाह भी उन्हें माफ कर देता है। लेकिन जो दूसरों को माफ नहीं करते, अल्लाह उनसे कैसे मोहब्बत कर पाएगा। ईसाई धर्म के प्रवर्तक यीशु मसीह तो जीवन की आखरी सांस के वक्त तक क्षमादान का परचम लहराते रहे। उन्हें जब लोग सूली पर चढ़ा रहे थे, उनके माथे, गले, हाथों और पैरों में क्रॉस पर चढ़ाकर कीलें ठोंकी जा रही थी, तब भी वे कह रहे थे-हे प्रभू इन्हें माफ कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। गीता, रामायण, महाभारत आदि हिन्दु शास्त्रों में भी क्षमादान को श्रेष्ठ दान और क्षमा याचना को श्रेष्ठ मांग माना गया है। भगवान महावीर के जियो और जीने दो सिद्धांत का क्षमा में ही निहितार्थ है। कोई भी जब तक अभय नहीं होगा, जी नहीं पाएगा। आप जानते ही हैं कि कोई भी क्षमा पाकर अभय हो जाता है। मतलब, हम क्षमादान देने के साथ ही अभयदान भी दे देते हैं। जैन धर्म ही एक ऐसा धर्ण है, जिसमें क्षमापना को पर्व के रूप में मनाया जाता है। दरअसल, इस महापर्व की सार्थकता तभी पूरी होगी, जब हम सारे ही अहंकारों का त्याग करके स्वच्छ मन से सभी को क्षमादान सहित अभयदान दें। आप सभी को संपूर्ण समर्पण के साथ मेरा मिच्छामि दुक्कड़म्। आपसे एक विनती है कि मेरी यह क्षमा याचना स्वीकारने के तत्काल बाद एक बार आप अपना चेहरा आईने में अवश्य निहारें, अपना दावा है कि आप खुद को बहुत ही सुंदर पाएंगे, इतना सुंदर कि पहले कभी नहीं देखा होगा।

आत्म शोधन का महापर्व है पर्युषण

पर्यूषण महापर्व आठ दिनों तक मनाया जानेवाला आध्यत्मिक पर्व है। हमारी संस्कृति में आठ की संख्या का बड़ा महत्व है - अष्ट मंगल, अष्ट कर्म, अष्ट सिद्धि, अष्ट बुद्धि, अष्ट प्रवचन माता आदि। अतः पर्यूषण महापर्व भी अष्ट दिवसीय होता हैं। नदियों में गंगा, शत्रुंजय तिर्थों में, पर्वतों में सुमेरु, मंत्रों में नवकार, नक्षत्रों में चन्द्रमा, पक्षियों में उत्तमहंस, कुल में ऋषभदेव - वंश, तप में मुनियों का तप, उसी प्रकार पर्वों में पर्यूषण पर्व सर्वश्रेष्ठ है। अतः यह महापर्व कहलाता हैं। यद्यपि जैन धर्म के सभी पर्व महत्वपूर्ण हैं, परन्तु पर्वाधिराज का पद तो पर्यूषण पर्व को ही दिया गया है। पर्यूषण पर्व हमको मोह निद्रा में से जगाता है। पर्यूषण के आरंभ के सात दिवस साधना के होते है एवं अंतिम संवत्सरी का दिवस सिद्धि का दिवस है। यह महापर्व मनुष्य को सचेत करनेवाला एवं मोक्ष प्राप्त करानेवाला हैं। यदि ऐसे पवित्र पर्व में भी मोक्ष का प्रामाणिक प्रयत्न करने से चूक गए तो मनुष्य - जन्म व्यर्थ चला जायेगा। पर्यूषण पर्व प्रायश्चित का पुनित अवसर है।

मोह, माया, राग, द्वेष एवं आशक्तियां मनुष्य को जाने-अनजाने पापकर्म के लिए प्रवृत्त करती है। अध्यात्म पर्व हमको इनमें से अनावृत्त होने की प्रेरणा देता हैं। जीव मात्र के प्रति मैत्रीभाव एवं करुणा भाव द्वारा हृदय को निर्मल बनाने की भावना प्राप्त करने की प्रेरणा ऐसे अध्यातम पर्व प्रदान करते हैं। पर्यूषण ऐसे अध्यात्म पर्व प्रदान करते हैं। पर्यूषण को पर्वाधिराज या महापर्व इसलिए कहा जाता है कि इस पर्व की दृष्टी अध्यात्मोन्मुखी है। इस पर्व में विशुद्ध आत्मभाव-वीतराग भाव की साधना की जाती हैं। पर्यूषण पर्व का मुख्य ध्येय और लक्ष्य यही है कि आत्मा को पवित्र बनाकर उसमें सद्गुणों का बाग लगाना। मानव शरीर मात्र ही नही है, किन्तु आत्मा है। शरीर तो आत्मा के ऊपर लिबास मात्र है। आत्मा को पवित्र करना ही मानव जीवन का सार हैं। वस्तुतः पर्यूषण पर्व का प्रायोजन आत्मा को निर्मल और स्वाधीन बनाना हैं। मन और बुद्धि को अहंकार, ममकार, काम, क्रोध, मोह आदि की मलिनता से हटाकर उन्हे परिमार्जित करके पुनः अपने लक्ष्य की ओर, आत्म-शुद्धि और आत्म-मुक्ति की ओर लगान हैं, अपनी आत्मा की उन्नति करनी हैं। इस प्रकार आत्मशुद्धि के साथ-साथ अपने आत्मिक विकास एवं आत्मोन्नति का सही लेखा - जोखा करना इस पर्व का उद्देश्य हैं। यह पर्व मनाया ही इसलिए जाता है कि आत्म - जागरण हो, आत्म - स्फुरणा हो। यह आत्म जागृति का पर्व हैं। इसलिए जैन जगत में इसका अत्याधिक महत्व हैं। साथ ही यह विश्व मैत्री का प्रेरक होने से संसार का एक मात्र अनूठा पर्व है।


http://paryushan.shatabdigaurav.com/aatam-shodhan.html

पर्यूषण पर्व अष्टान्हिका महोत्सव क्यों?

पर्युषण शब्द की परिभाषा व व्याख्या विभिन्न आचार्यों, साधु-साध्वियों ने विभिन्न विभिन्न रुप से की है। पर्युषण शब्द का सन्धि-विच्छेद करते हुए परि*उषण। परि का मतलब होता है चारों ओर से, सब तरफ से तथा उषण का अर्थ है दाह। जिस पर्व में कर्मों का दाह। विनाश किया जाये वह पर्यूषण शब्द के पर्यायवाची १) पज्जुसणा २) पज्जोसमणा ३) पज्जोसवणा ४) परिजुसणा ५) परिवजणा ६) पज्जुवासणा ७) परियाय ठवणा ८) पज्जूसण । पर्यूषण पर्व जैन धर्म का महान पर्व है। इस महान पर्व में सभी जैन श्रावक-श्राविकाएंं छोटे-छोटे बच्चे भी तपश्चर्या, व्रत, जप, आराधना करते हैं। अपने शरीर, मन, आत्मा को शुद्ध करने का महान पर्व पर्युषण पर्व है। संवत्सरी के दिन प्रतिक्रमण कर अपने व्यवहार, कर्म, बोलचाल आदि से हुई। असातना गलतियों के लिए प्राणीमात्र से क्षमा याचना करते हैं। पर्यूषण पर्व आठ दिन का होता है, इसलिए इसे आष्टान्हिक पर्व भी कहा गया है। अब प्रश्न यह उठता है कि जैन धर्म का यह प्रमुख पर्व पर्युषण महापर्व आठ दिनों का ही क्यों निर्धारित किया गया है।

सात, नौ या अन्य दिनों का क्यों नहीं तो उसका उत्तर है कि- हमारी आत्मा के आठ प्रमाद है।
१) अज्ञान
२) संशय
३) मिथ्या ज्ञान
४) राग
५) द्वेष
६) स्मृति (स्मृति-भ्रंश)
७) धर्म-अनादर,
८) योग
दुष्परिणाम। में फंसी हुई आठ मद
१) जाति
२) कुल
३) बल
४) रुप
५) तप
६) लाभ
७) श्रुत
८) ऐश्वर्य,
ऐश्वर्य के कारण ८ कर्म -
१) ज्ञानावरणीय
२) दर्शनावरणीय
3) वेदनीय
४) मोहनीय
५) आयु
६) नाम
७) गौत्र
८) अनाराम- से आवृत्त होकर अपनी सच्ची अलौकिक शक्ति तथा ज्ञान को खोती चली जा रही है।

जब तक हर मानव आठो प्रमादों, मद और कर्म से स्वयं को परे नहीं रखेगा, इनका त्याग नहीं करेगा, तब तक उसे सच्चा ज्ञान और सच्चा दर्शन होना दुर्लभ है। इसीलिए पर्यूषण महापर्व क्रमशः इन्हीं आठ विकारों से आत्मा को परिमुक्त करने हेतु आठ दिन तक मनाया जाता है। आठ विकारों के नाश के पश्चात् ही आठ आत्मगुण - १) अनन्त ज्ञान २) अनन्त दर्शन ३) अनन्त सुख ४) अनन्त चरित्र ५) अटल अवगाहन ६) अमूर्तिक ७) अगुरु लघु ८) अनन्त बलवीर्य की प्राप्ति होती है। उत्तराध्ययन सूत्र ११ (४-५) में आठ बातें बतलायी गयी है, जिनका यदि पर्यूषण पर्व में अभ्यास किया जाए तो जीवन में नया प्रकाश व नई चेतना की स्फूरणा हो सकती है।
१) शांति
२) इन्द्रिय दमन
३) स्वदोष दृष्टि
४) सदाचार
५) ब्रह्मचर्य
६) अलो लुप्ता
७) अक्रोध
८) सत्याग्रह।
आठ विकारों को नाश करने के लिए आठ शिक्षाएं आठ शील के गुम, आठ प्रवचन माता की आज्ञा से देव, गुरु, धर्म एवं ५ व्रत इन आठ का श्रद्धापूर्वक आचरण करने के लिए अरिहन्तसिद्ध आचार्य उपाध्याय-साधु साध्वी श्रावक और श्राविका। इन ८ पदों की निकट सम्फता सम्यकत्व के ८ आचारों का निर्दोष पालन और आचार्य की ८ संपदाओं के स्मरण के रूप में इन ८ दिनों का महत्व स्वतः सिद्ध हो जाता है। प्राचीन काल में ८ दिन के उत्सव होते थे तथा किसी भी शुभ कार्य में ८ का योग होना अच्छा मानते थे। मंगल आठ माने गए हैं। सिद्ध भगवान के भी ८ गुण बताए हैं। साधु की प्रवचन माता आठ है। संयम के भी आठ भेद बताए गए हैं। योग के ८ अंग हैं। आत्मा के रूचक प्रदेश भी आठ हैं। इस प्रकार आठ की गणना बड़ी महत्वपूर्ण रही है। वर्ष भर में सांसारिक निजी प्रपंचों में उलझे मानव को पर्यूषण महापर्व के आठ दिनों में तो तप आराधना कर आठ विकारों का नाश कर आठ गुणों को प्राप्त करने का प्रयास कर मानव जीवन सफल सार्थक बनाने हेतु त्याग-तपस्या करनी चाहिए।

भारतीय लोकतंत्र महावीर की देन

भारतीय लोकतंत्र विश्व के सभी देशों में अपना अनूठा स्थान रखता है। भारत में लोकतंत्र की स्थापना हुए मात्र साठ वर्ष ही हुए हैं। परंतु प्राचीनकाल से ही इसके सिद्धांतों का प्रार्दभाव हो चुका था। भगवान महावीर के दर्शन में इसका स्पष्ट उदाहरण मिलता है। महावीर लोकतंत्र सिद्धांत समानता का था। महावीर के अनुसार आत्मीक समानता की अनुभूति के बिना अहिसाविफल हो जाती है। साथ ही समानता के अभाव में उत्पन्न सामाजिक एवं राजनीतिक विषमताएं गणराज्य की विफलता का मूल कारण हैं। महावीर ने आत्म निर्णय के अधिकार प विशेष बल दिया है। उन्होंने कहा था सुख और दुख दोनों तुम्हारी ही सृष्टि है। तुम्हीं अपने मित्र हो और तुम्हीं अपने शत्रु। यह निर्णय तुम्ही को करना है, तुम क्या होना चाहते हो। जनतंत्र के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्धांत है। जहां व्यक्ति को आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं होता, वहां उसका कर्तव्य कुंठित हो जाता है। नव निर्माण के लिए पुरुषार्थ और पुरुषार्थ के लिए आत्म निर्णय का अधिकार आवश्यक है। महावीर का एक अन्य सिद्धांत सापेक्षता। का अर्थ है, सबको समान अवसर। बिलौना करते समय एक हाथ पीछे जाता है और दूसरा आगे आता है। इस क्रम से नवीनता निकलता है। चलते समय एक पैर आगे बढता है, दूसरा पीछे। फिर आगे वाला पीछे और पीछे वाला आगे आ जाता है। इस क्रम से गति होती है। आदमी आगे बढ़ता है। यह सापेक्षता ही स्यादवाद का रहस्य है। इसी के द्वारा सत्य का ज्ञान और उसका निरूपण होता है। यह सिद्धांत जनतंत्र की रीढ़ है। कुछेक व्यक्ति सत्ता, अधिकारी और पद से चिपककर बैठ जाएं दूसरों को अवसर न दें तो असंतोष की ज्वाला भभक उठती है। यह सापेक्ष नीति गुटबंदी को कम करने में काफी काम कर सकती है। नीतियां भिन्न होने पर भी यदि सापेक्षता हो, तो अवांछनीय अलगाव नहीं होता। महावीर के ये समस्त सिद्धांत मुक्ति के परिचायक हैं। जो आज जनतंत्र में व्यावहारिक मुक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं।

04 September 2010

CHANDANBALA

There once was a beautiful princess named Vasumati. She was the daughter of king Dadhivahan and queen Dharini of Champapuri.
One day war broke out between the King of Champapuri and the king of nearby Kaushambi. It was a sad war. Vasumati's father could not win the war, so he had to run away in despair. When Vasumati and her mother learned that they had lost the war, they also decided to escape. While they were running away in the woods, a soldier from the enemy's army spotted them and captured both of them. Vasumati and her mother were scared. They didn't know what the soldier would do to them. He told the older lady (mother) that he would marry her, and that he would sell Vasumati. Upon hearing this, the queen went into shock and died. The soldier immediately felt sorry for his remark, and decided not to make anymore comments. He took Vasumati to Kaushambi to sell her.
When Vasumati's turn came to be sold as a slave, a merchant named Dhanavah happened to be passing by. He saw Vasumati being sold and felt that she wasn't an ordinary girl. He thought she might have been separated from her parents, and if she was sold as a slave, what would her fate be? So out of compassion for her, Dhanavah bought Vasumati, freed her from slavery, and took her home. On the way home he asked her, "Who are you? What happened to your parents? Please don't be afraid of me. I will treat you as my daughter." Vasumati didn't reply.
When they got home, the merchant told his wife, Moola, about Vasumati. "My dear," he said, "I have brought this girl home. She has not said anything about her past. Please, treat her like our daughter." Vasumati was relieved. She thanked the merchant and his wife with respect. The merchant's family was very happy with her. They named her Chandanbala, since she wouldn't tell anyone her real name.
While staying at the merchant's house, Chandanbala's attitude was like that of a daughter. This made the merchant very happy. Moola, on the other hand, was wondering what her husband would do with Chandanbala. She thought that he would marry her because of her beauty. Therefore, Moola was never comfortable with Chandanbala around.
One sunny day, when the merchant came home from his shop, the servant who usually washed his feet was not there. Chandanbala noticed this, and felt delighted to get a chance to wash his feet for all the fatherly good things he had done for her. While she was busy washing the merchant's feet, her hair slipped out of the hair pin. The merchant saw this and felt that her hair might get dirty. So he lifted her hair and clipped it on the back of her head. Moola saw all this and was outraged. She felt that her doubts about Chandanbala were true. Moola decided to get rid of Chandanbala as soon as possible.
When Dhanavah went on a three day business trip, his wife took the chance to get rid of Chandanbala. Right away she called a barber to cut off all of Chandanbala's beautiful hair. Then she tied Chandanbala's legs with heavy chains and locked her into a distant room, away from the main area of the house. She told all the servants not to tell the merchant where Chandanbala was, or she would do the same to them. Then Moola left to go to her parent's house.
When Danavah returned back from his trip, he didn't see either Moola or Chandanbala. He asked the servants about them. The servants told him that Moola was at her parent's house, but they didn't tell him where Chandanbala was because of their fear of Moola.
He asked the servants in a worried tone, "Where is my daughter Chandanbala? You better speak up now, because if you are hiding the truth, then you will be fired." Still nobody replied. He was very upset and didn't know what to do. After a few minutes an older servant thought, "I am an old woman and will soon die anyway because of age. What is the worse Moola can do anyway." So out of compassion for Chandanbala and sympathy for the merchant she told him all about what Moola did to Chandanbala.
She took the merchant to the room where Chandanbala was locked up. Dhanavah unlocked the door and saw Chandanbala. He was shocked when he saw her. He told Chandanbala, "My dear daughter, I will get you out of here. You must be hungry, let me find some food for you." He went to the kitchen to find food for her. He found that there was no food left, but only some dry lentils in a pan. The merchant decided to feed her that for the time being. So he took them to Chandanbala. He told her that he was going to get a blacksmith to cut off the heavy chains and so he left.
Chandanbala was amazed at how things were going. She started wondering how fate can change the life from rich to almost helpless. Chandanbala then thought of offering lentils to someone else before eating. She got up and walked to the door, and stood there with one foot outside and one inside.
To her surprise, she saw a monk (Lord Mahavir) walking near her room. She said, "Oh respected monk, please accept this food which is suitable for you." But Lord Mahavir had taken vow to fast until a person who met a certain conditions and offered him food. His conditions were, 1) the person who would be offering should be a princess, 2) she should be bald headed, 3) she should be in chains, 4) she should offer uncooked lentils, with one foot inside the house and other outside, 5) and she should be in tears. Therefore, Lord Mahavir looked at her and noticed that one of his pre-decided conditions was still missing. She met all conditions except the tears in her eyes, and therefore Lord Mahavir went on. Chandanbala felt very sad and tears started running down her face. She was sad that even though she had the chance to offer food to the monk, he would not accept it. In her crying voice, she once again requested the monk to accept the food. Lord Mahavir saw the tears in her eyes, and came back to accept the food knowing that all his conditions were met. Chanada put the lentils in Lord Mahavir's hand and felt satisfied.
While Lord Mahavir was looking for his pre-conditioned person, he had fasted for five months and twenty-five days. Heavenly angels celebrated the end of Lord Mahavir's fasting. By the angels power, Chandanbala's chains were broken, her hair grew back, and she was dressed as a princess. The loud music and a celebration drew the attention of king Shatanikand. He came to this place with his family, ministers and other people. Sampul, an old servant, recognized Chandanbala. He walked towards her, bowed, and broke out in tears. King Shatanikand asked, "Why are you crying?" Sampul replied, "My king, this is Vasumati the princess of Champapuri, daughter of king Dadhivahan and queen Dharinee." The king and queen now recognized her, and invited her to live with them. So she went, but first thanked the merchant Dhanavah who was so kind to her.
Lateron, when Lord Mahavir attained the perfect knowledge, he reestablished the four-fold order of Jain Sangh (community). At that time, Chandanbala took diksha and became the first nun (sadhvi). The end of that life, Chandanbala achieved liberation.


Web link:- http://jainstory.com/index.php?option=com_content&view=article&id=15:chandanbala&catid=6:jain-mahasati-story&Itemid=1

21 August 2010

Avinandan Samaroh



Mumukshu Madhu Dudhoria ka Avinandan Samaroh AD in Sanmarg or Rajesthan Patrika by SOUTH HOWRAH SHREE JAIN SWATEMBER TERAPANTHI SABHA.

11 July 2010

Alankran

Sardarshahar 10th Jul 2010 : ACHRYASHRI NE AAJ
MUNI DHANANJAYKUMARJI KO SHASHAN GAURAV,
MUNI RAJENDRA KUMARJI KO SHASHANSHRI
&
SADHAVI SUBHPRABHAJI KO SHASHANSHRI
SE ALANKRIT KIYA

Pratikraman - Observance of Self-Reflection :- Acharya MAhasraman Ji

Jainism believes that from times immemorial, every soul has assumed perverted impure nature. Attachment and aversion are the soul’s impurities. All other impurities such as anger, ego, deceit, greed, and others are sub-categories of these two impurities. To help to remove such impurities, Jainism has emphasized certain practices to be performed regularly by its followers known as Ävashyaka (essential practices). These practices free the human mind from negative thoughts of attachment and aversions and enhance soul's spiritual progress which ultimately leads to liberation.

Ancient Jain literature defines six such activities of which Pratikramana is defined as 4th Ävashyak to be performed daily by its followers.
The six practices are:
1. Sämäyika Equanimity
2. Chaturvimshati-Stava Devotional Prayer
3. Vandanä Respecting Ascetics
4. Pratikraman Repentance and Confession of sins
5. Käyotsarga Non-attachment to the Body
6. Pratyäkhyäna / Pachchakhäna Religious Vows

Pratikramana
"Prati" means "back" and "kraman" means "to go", i.e. to go back, to reflect and review, to confess and atone for transgressions of mind, body, and speech in one’s daily activities. In other words, it means returning to and reaffirming the path of nonviolence, truthfulness, and non-attachment. Pratikraman means sincerely repenting and confessing our faults, forgiving faults of others, asking forgiveness from others for one’s own transgressions, and extending friendship to all.

The Pratikraman ritual includes many original texts (Sutras) written in Ardha-Mägadhi and Sanskrit languages. These Sutras consist of many hymns in praise of Tirthankaras and many verses of repentance, confession, and requests for forgiveness.
Jain community is divided into two main sects - Shvetämbar and Digambar. Again, Shvetämbar sect has two branches - Murtipujak and Sthänakaväsi. In these two branches six essential acts are performed daily. Monks of these two branches have to necessarily perform these acts in accordance with the tradition. Devoted Jain laypeople staunchly observe them. All others voluntarily practice them.

During the last few centuries of Jain literature work indicate that the word “Pratikraman” is used as a common noun for all six essential acts (six Ävashyaka). This is also meaningful because during the course of time the Pratikraman ritual is enhanced to include all six Ävashyaka.

Hence entire Pratikraman ritual which covers all six Ävashyaka or six essential acts, occupies such an important place in the Jain tradition as does Sandhyä in the Vedic (Hindu) tradition, Namäj in the Islam, Kharavela Avesta in the Zoroastrian, Prärthanä (Prayer) in the Jew and the Christian.

It is recommended that Pratikraman be done twice a day, once in the morning (called Räi Pratikraman) and once in the evening (called Devasi Pratikraman). The morning Pratikraman is for the atonement of transgressions incurred during the night and the evening Pratikraman is for the transgressions of the day. There is provision for fortnight (Pakkhi), once every four months (Chaumäsi), and yearly (Samvatsari) Pratikraman observances, if one is unable to comply with the daily Pratikramans. The annual Pratikraman that all Jains should strive to observe is called Samvatsari Pratikraman. The Samvatsari Pratikraman is performed on the last day of Paryushan.

Pratikraman and Six Essentials:
1. Sämäyika - Equanimity
To remain in the state of equanimity without yielding to attachment and aversion and treat all living beings equal to one’s own self is called Sämäyika. This procedure is performed to cultivate equal regard towards all living beings, equanimity towards pleasure and pain, and to be free from attachment and aversion. The Sämäyika is performed at the commencement of the observance of Pratikraman ritual.
2. Chaturvimshati Stava - Prayer:
This is the reverential worship of the twenty-four Tirthankars to reflect on their qualities, such as freedom from attachment and aversion (Vitaräga). This devotional prayer is also of two types; external (dravya) and internal (bhãva). To express one’s devotion by worshipping them with good purifying substances like rice and flower is the external praise (dravya stuti). And to praise devotionally their internal natural qualities is the internal praise (bhãva stuti). The prayer inspires an individual to practice these ideals in one’s own life. During Pratikraman ritual, this is accomplished through the recitation of Logassa and Namutthunam Sutras.
3. Vandanä – Respecting Ascetics
Vandanä means offering of respectful salutations to all ascetics such as Ächäryas, Upädhyäyas, and other monks and nuns. The suguru vandanä sutra is recited during Pratikraman to pay respect and obeisance to the ascetics and teachers. .
4. Pratikraman – Repentance and Confession of Sins
Pratikraman means to repent and confess past sinful deeds and thoughts, to protect oneself through the process of spiritual discipline from the present sinful acts, and to prevent the future sinful acts through renunciation. Hence Pratikraman means to go back, to reflect and review, to confess and atone for transgressions of mind, body, and speech in one’s daily activities.
Alongside the six rites, the Jain ethics system outlines 12 vows of limited nature to be practiced by the lay people that are less intense than those followed by monks and nuns who have totally renounced worldly life. Jainism defines that every one should strive to adopt these vows according to one's individual capacity and circumstances. The ultimate goal is to accept them as full vows.

During the Pratikraman, a lay person reflects on these vows. One would repent and ask for forgiveness for one’s past minor transgressions that may have occurred knowingly or unknowingly. One would contemplate on each of these vows so that one would be more aware of such circumstances and would avoid such transgressions in the future.

One should know that to effectively guard against sinful activities, one should abandon wrong belief (Mithyätva), non-restraint (Avirati), unawareness or lethargy (Pramäda), passions (Kashäya) and inauspicious activity (Aprashasta Yoga). To accept right belief after having given up the wrong one, to achieve self-restraint after having shunned non-restraint, to become spiritually vigilant after having abandoned lethargy, to cultivate good qualities like perseverance after having renounced passions and to attain the true nature of soul after having given up worldly activities is Pratikraman.

If one only performs the Pratikraman ritual through bodily and verbal acts, and just verbally confesses the past sinful acts and makes open declaration not to commit them in future, but in real life one continues to commit sinful activities without any hesitation, then this type of recitation of ritual is called Dravya or external Pratikraman. The Dravya Pratikraman is not useful, but on the contrarily it is harmful. It deceives one own self and it meant simply to deceive others.

If after the performance of Pratikraman ritual, one minimizes or eliminates the sinful activities in real life then the Pratikraman is called Bhäva or internal Pratikraman, which is very useful for the purification of the soul.
During Pratikraman ritual, this is accomplished through the recitation of Ascetics Forgiveness Sutra (Abbhutthio Sutra), Atonement of Eighteen Sins (18 Päpsthänak), and Vandittu Sutra reflecting on Transgression of twelve vows of the laypeople.

5. Käyotsarga – Non-attachment to the Body
Käyä means body and Utsarga means moving away or rising above. Therefore, Käyotsarga means rising above the physical body activities to focus on the inner self and thus, develop non-attachment (Käyotsarga) towards our human body. To perform Käyotsarga in its true definite form one should also give up all the defilements from one’s life.

One needs to renounce attachment to one’s body to attain proper concentration, which is required for virtuous meditation (Dharma Dhyäna) and pure meditation (Shukla Dhyäna). During Pratikraman ritual, this is accomplished during meditation after repentance and confession of sins. Also the Pratikraman is performed while sitting or standing in the meditating position, practicing Käyotsarga throughout the ritual.

Pratyäkhyäna / Pachchakhäna – Religious Vows
Taking religious vows (Renunciation) and its declaration is called pratyäkhyäna. It too is of two types - external (Dravya) and internal (Bhãva). Renunciation of external things like food, clothes etc. is external renunciation (Dravya pratyäkhyäna). And renunciation of internal impure states of soul, viz, ignorance, anger, greed, ego, deceit, non-restraint, attachment and aversion generated in soul is internal renunciation (Bhäva Pratyäkhyäna).


One can not attain true Bhäva Pratyäkhyäna without performing complete Dravya Pratyäkhyäna. Hence in the beginning one needs to renounce junk and tasty food, renounce all luxuries, and live a simple life. Now the true performance of Bhãva pratyäkhyäna (true renunciation) leads to stoppage of karma (Samvara) gives rise to ultimate equanimity (Sambhava) which in turn leads to the attainment of liberation.
At the conclusion of the Pratikraman one chooses to observe certain vows (within one's own capacity). This practice fosters spiritual advancement through self-control.

Conclusion

Jain literature clearly indicates that Pratikraman ritual is meant for repenting and requesting forgiveness for “one’s past minor transgressions of the vows that may have occurred knowingly or unknowingly”. The vows for monks and nuns are 5 great vows and for laypeople are 12 vows of limited nature. Hence only monks, nuns and laypeople those who follow these vows are eligible for Pratikraman. The logic is that if one does not practice the vows then question of repenting and forgiveness of minor transgression of the vows does not arise.
Many Jain laypeople do not practice 12 vows. Hence after understanding the purpose and meaning of our great ritual, every Jain should strive to adopt the 12 vows of laypeople according to one's individual capacity and circumstances. They should review them before Samvatsari Pratikramana and improve the limit every year in such a way that ultimately they will be full vows.

Hence by performing Pratikraman one completes all six essential acts which are required by Jain tradition for our spiritual progress.

15 May 2010

गुरू के विरह को सहना कठिन

सरदारशहर। श्रीसमवसरण में स्मृति सभा के दूसरे दिन बुधवार को आचार्य महाश्रमण ने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञ के अधूरे कामों को पूरा करने के लिए अपने आप को तैयार करना ही उन्हे श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ के सामने कठिन परिस्थितियां हैं। जहां गुरू शिष्य का आत्मिक संबंध होता है वहां समता न रख पाना कोई बडी बात नहीं है। गुरू के विरह को सहन करना कठिन होता है।

भगवान महावीर के निर्वाण होने पर गणधर गोतम भी विचलित हो गए थे। महाश्रमण ने कहा कि जितनी समता की साधना बढेगी उतनी ही वीतरागता नजदीक आएगी। आचार्य महाप्रज्ञ के पास बचपन से रहने वाले ज्येष्ठ मुनि सुमेरमल सुदर्शन ने कहा कि उनकी कृपा नहीं होती तो वे जीवन में आने वाले संघर्षों में कहां खो जाते कुछ पता नहीं। उन्होंने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञ ने तेरापंथ के सभी आचार्यो के कीर्तिमान को स्थान दिया है।

मुनि महेन्द्र कुमार ने कहा कि आचार्य महाप्रज्ञ अमर थे, अमर हैं और अमर रहेंगे। मुनि किशनलाल ने श्रद्धांजलि व्यक्त की तथा मुनि श्रवण ने देश-विदेश के प्रतिष्ठित लोगों की ओर से भेजी गई संवेदनाओं का वाचन किया। मुनि योगेश कुमार, मुनि जितेन्द्र कुमार, बाल मुनि मृदुकुमार, साध्वी जिन प्रज्ञा, साध्वी पीयूष प्रभा, जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के कुलपति समणी डा. मंगल प्रज्ञा, समणी नियोजिका, समणी मधुरप्रज्ञा, समणी प्रतिभा प्रज्ञा ने भावांजलियां प्रस्तुत की।

14 May 2010

Acharya Mahapragya

Sun can feel proud of it self if it pierces the dense layer of clouds and provides light to the earth. An artist is satisfied if he engraves and creates a lively statue from a huge unshaped rock. Acharya Mahapragya was one such personality who was gifted with both the virtues. A difficult job is encouraging for those who are transparent towards their goal and their commitment to serve mankind is evident. Nourishment amid darkness is meaningful only if it has ability to converge into light. “Nathu” as he was called in his childhood encouraged himself and got the nourishment to become Mahatma “Mahapragya”.Acharya Mahapragya born to Tolaramji Choraria and Baludevi Choraria at Tamkore (a small village in Jhunjhunun district of Rajasthan, India) in Choraria family was famous for his simple undeveloped image. But once he was admitted to monk hood by Acharya Kalugani, the 8th Acharya of Terapanth Order, he began his steps of the long journey of about 80 years under able guidance of Acharya Shri Tulsi. His determination, devotion, effort, politeness, sense of gratitude and his journey around soul enabled him to make great contribution to the society and world at large by discovery of modern meditation techniques named – ‘Preksha Meditation’ and ‘Science of Living ‘ to teach people the art of living purposeful life.
His enlightened spirituality has offered great solution to the modern world problem of terrorism, nonviolence and economic imbalances. His philosophy of relative economics offers amazing solution to the modern economic recession and related problems. His way of presentation of the teachings of Lord Mahavira i.e. principles of truth, non-stealing, non-violence, practice of chastity and non possessiveness have made Lord Mahavira more meaningful in the present scenario.
He has in the young age of about 80 years commenced the Ahimsa Yatra and studied the root causes of violence and has been regularly preaching people to remove those evils to eradicate terrorism and violence from the earth. Besides the Study of the modern problems he never ignored the smallest unit of the institution named family. He always preached to develop Equanimity, amity, assurance, compassion, affection, tolerance, endurance, encouragement of others to have peaceful co existence. He was a world renowned philosopher, writer of hundreds of books and commentaries. Even though he did not complete formal primary education, he has created such literary works that many research scholars have completed their Phd. on his literature.

Being a member of the Choraria Family of Tamkore, I too feel proud of the contributions made by His Holiness. His glorified effort has made the tiny village of Tamkore more prominent on the World Map.

The news of his untimely demise came as a great shock to our family. We are deeply saddened. a large vacuum has been created. I pray for his spiritual journey abode. May his soul get liberation from the bondage of karma and attain Moksha soon. I pray for myself to apply his teachings and experiments for spiritual development of my own soul.
I bow with folded hands –


OM NAMAH MAHAPRAGYA GURUVAI NAMAH !


FROM: SUSHIL KUMAR JAIN (CHORARIA), TAMKORE, KOLKATA

Acharya Mahapragya cremated Raj Sadosh

Sriganganagar/Abohar, May 10
Acharya Mahapragya, the 10th Acharya and supreme head of the Jain Swetambar Terapanth community was cremated today evening in Sardarshehar — the place where he gained monkhood and where he was staying for the past few days to conduct Chaturmaas.

Former President Abdul Kalam, who had co-authored a book with the Mahapragya, too turned up and said “I have come here for ‘antim darshan’ of the great saint and philosopher".

Special emissaries of President Pratibha Patil, AICC president Sonia Gandhi and Gujarat Chief Minister Narendra Modi visited the town to deliver condolence messages. Modi was expected to attend the funeral procession but the programme was changed.

Baikunthi (procession carrying body of the deceased saint) was taken out from Shree Samvasaran complex where tens of thousands of devotees had made a beeline to have ‘antim darshan.’ People stood on both sides with folded hands, most of them bowing heads in reverence as the procession proceeded to the cremation ground through main roads of the historic town.

Punjab Governor Shivraj Patil said in his message, “The Acharya was a great sage and philosopher who gave a new direction to Anuvrat movement and spread the message of non-violence through his Ahimsa Yatra.”

Rajasthan Chief Minister Ashok Gehlot, his cabinet colleagues and other prominent people, attended the funeral along with Rajasthan Pradesh Congress president and Central minister CP Joshi. “He was a guru to all, including followers of other communities,” said state home minister Shanti Dhariwal. Gehlot said, “The country has lost a great guru and a social reformer.” Former CM Vasundhara Raje and Rajasthan BJP president Arun Chaturvedi too condoled the demise.

Notably, late Indian President S Radhakrishnan had termed Acharya Mahapragya (then known as Muni Nathmal) as one of the two finest philosophers of modern India along with Swami Vivekananda. Acharya Mahapragya is credited with the formulation of the ‘preksha’ meditation system in 1970s. He was also the supreme head of Jain Vishva Bharati University and played a key role in its establishment. He also took forward the Anuvrat movement launched by Acharya Tulsi.

Lalit Garg

A brilliant mind – a beloved teacher — Sudhamahi Regunathan—

It is a struggle to find the right words to describe Acharya Mahaprajna. Either idolatry adjectives describe him best, like ‘the greatest saint’, “an apostle of peace”, ‘a supermind’ and so on. Or they fall wide off the mark and are tame semblances to the perfect picture. Acharya Mahaprajna referred to himself as an ascetic or a student of philosophy. So be it.

On Sunday the 9th of May 2010, Acharya Mahaprajna, the tenth spiritual head of the Terapanth Jain community left his bodily abode. The world lost a brilliant mind and the most twinkling pairs of eyes of his generation. Many people lost their precious teacher. He was ninety.

Nathmal, as his parents had named him, was the only son of businessman Tolaram and his wife Baluji. He was born on 14 th June 1920 in the village of Tamkor , Jhunjhunu district, Rajasthan. Even as Nathmal was playing with his friends, a sage passing through the village prophesied that this young boy would one day be a leader among men.

The little boy adjusted his pride possession, the gold watch and ran home, unaware of importance of what the saint had said. A few years later destiny saw Nathmal initiated into monk hood on 18th February 1930.

In today’s world of wondering and whimsical morals, Acharya Mahaprajna’s challenge was to be still relevant as a custodian of high principles and purity of heart. If he was equal to it, it was not just because of his erudition but also because of his alert mind which was in step with the ever-changing world with clarity and curiosity, not to mention humour.

Acharya Mahaprajna combined in his detachment, the best of enlightenment with an almost naive romanticism. And yet as a leader of a community he could take all kinds of people in his stride.

While Acharyaji practiced a religion that is seen as severe and dry ...he was anything but that. A sensitive writer, he wrote in every genre ranging from poetry to philosophy imbuing his writings with a sensitivity that was polished and subtle. Using his strength of self restraint like a musician uses a moment’s pause in his choreography Acharyaji wove layers of meaning into his writings.

Acharya Mahaprajna wrote in Hindi, Sanskrit and Prakrit. Elegance and logic are central to his writing be it in their clarity of thought, choosing the right word, not to mention writing with an element of suggestion and not with aggressive assertiveness.

Nonviolence was his religion. He saw it as the only solution to the problems of today and has written many books explaining its role in creating a peaceful society. He has also unfurled the idea of nonviolence in many aspects: as the other name for diplomacy, as respect for fellow beings and so on.

Walking across the length and breadth of the country became Acharya Mahaprajna’s method of seeking the truth. His interaction with people of diverse backgrounds and beliefs made him further develop the Jaina philosophical principle of anekanta which says everything is relative; even truth. Extending this idea as his basis for peaceful co-existence, this social artist - a communicator; a private, often enigmatic person was nonetheless keen to be widely and clearly understood, so as to draw more and more people towards a harmonious way of life.

Acharya Mahaprajna’s urge to communicate was not born of self aggrandizement for it spun far beyond his writings. He developed a system of meditation to nurture and protect the spirit of human kind. The problem of the present generation which would be bequeathed to the future, Acharya Mahaprajna said would be one of emotional imbalances. To keep control over emotions was a contemporary interpretation of the Jaina dictum for detachment. How to manage life and your mind without needing to become an ascetic?

In answer to this question he developed a system of meditation called Preksha dhyan which though eventually led you to moral edification, ans could in shorter spells calm the mind to attend to day to day matters without stress.

That which makes a lasting impact on everyone’s mind after a meeting with Acharya Mahaprajna is his affability. He was deeply revered and respected by not just the disciples in his fold and community members but also by intellectuals and influential people from all over the country. Under his patronage, urged by Dr. A.P.J Abdul Kalam, former President of India, Acharya Mahaprajna founded an organization for unity of religions and enlightened citizenship. The spiritual leaders from nine different religions who came together on the occasion had no hesitation in accepting Acharya Mahaprajna’s leadership.

When someone precious and deeply revered is no more, the happiest memories get recollected with regret bordering on sorrow. With Acharyaji there is a compulsive urge to fight such an expression. He gave so much so many people; he touched so many lives that one must be resolute, as perhaps he would have too, on treasure his influence beyond mourning.

So Acharya Mahaprajna lives on in many ways: first and foremost in the memories he leaves for those lucky enough to have known him or heard him speak, secondly in the system of meditation, preksha dhyan and thirdly in one of the most impressive and important bodies of work on philosophy and Jainism.

Lalit Garg

10 May 2010

आचार्य महाश्रमण उनके अगले उत्तराधिकारी

सरदारशहर(चूरू.) आचार्य महाश्रमण उनके अगले उत्तराधिकारी होंगे। उन्होंने अपने संदेश में कहा है कि तेरापंथ का दशम सूर्य अदृश्य हो गया। गुरुदेव का हम सब पर महान उपकार है। अब हम उनकी स्मृति कर सकते हैं, कृतज्ञता का भाव प्रकट कर सकते हैं। महाश्रमण ने कहा कि गुरुदेव ने मानव जाति, जैन शासन और तेरापंथ धर्मसंघ की महान सेवा की ।
मैं मेरे धर्मसंघ के सभी साधु-साध्वियों और समण श्रेणी की चित्त-समाधि के लिए प्रत्यन करता रहूंगा, यह मेरा संकल्प है। तेरापंथ धर्मसंघ के श्रावक समाज को भी आध्यात्मिक पोषण प्रदान करते रहने का संकल्प करता हूं। इसके अतिरिक्त जैन शासन और मानव जाति की यथासंभव और यथोचित सेवा करने का संकल्प करता हूं। इस कठिन परिस्थिति में हम सब मनोबल रखने का प्रयास करें और धर्मशासन की प्रभावना का प्रयास करते रहें।

Views

Stand on religion
Mahapragya says

"The religion which does not bring about a change in a man’s life, which does not impart peace to him, deserves to be thrown into the river Ganges rather than carried on as burden on one’s shoulders. Rituals or idol worship alone are not enough unless one’s conduct also gets transformed. Religion is not confined only to temples, mosques or churches, but extends to the man’s day-to-day living as well."[50]

"I believe in that religion which has moral values at its foundation and spirituality at its peak. I don't believe in that religion that doesn't have moral values and spirituality. I accepted that religion which made me physically, mentally, emotionally healthy. Religion is beyond rituals. Religion has the ability to solve our problems if you believe in pure religion."[51]

Influence

Rashtrakavi (National poet) Ram Dhari Singh Dinkar said “Mahapragya is a Modern Vivekananda. We have not seen Vivekananda, only heard and read about him. But now we can see Vivekananda through his Vision”[36].

Ex Indian Prime Minister Atal Bihari Vajpayee has often said in mass meetings “I am a lover of Mahapragya’s literature”. The Eminent Scholar of Philosophy, Dr. Daya Krishna has recognized Acharya Shri Mahapragya as the most knowledgeable person on the subject of Jain Logic.

The famous Bangla writer Shri Bimal Mitra used to say, “I find new truth in Mahapragya’s work. When I read his books, I feel as if I write for the masses and he writes for me. If only I could have met him in the initial stages of my career, my literature would have had a new path to follow”.

Dr. A.L. Bashim says "While meeting Acharya Mahapragya, one gets the thrill of meeting the ‘Spiritual Ideal’ or the ‘Wonder that India was’".


Awards and Honours

  • Mother Teresa National award of peace by Inter faith Harmony foundation of India in 2005
  • Communal harmony award i.e. Sampradayika Sadbhavana Puraskar by Govt. of India in 2004[52]
  • Ambassador of Peace (London) by Inter Religions and international federation in 2003
  • Lokmaharshi by New Mumbai Municipal corporation in 2003
  • Indira Gandhi National Integration award in 2002
  • D.Litt by Netherland Inter Cultural Open University in 1999
Death
Acharya Mahapragya died on 9th May 2010 at 2:52 PM in Sardar Sahar, the place where he gained monkhood

http://en.wikipedia.org/wiki/Acharya_Mahapragya