प्रज्ञापाथेय
रविवार, मई 17, 2026

जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय (लाडनूँ) में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ

शिक्षा समाचार

जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय (लाडनूँ) में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ

📍 लाडनूँ (राजस्थान) | सत्र: 2026-27
🏅 NAAC द्वारा 'A' ग्रेड से मान्यता प्राप्त (UGC Act 1956)

फोटो: जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय प्रवेश सूचना (सत्र 2026-27)

लाडनूँ। देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में शुमार जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए विभिन्न स्नातक (UG), स्नातकोत्तर (PG), डिप्लोमा और पीएचडी पाठ्यक्रमों में प्रवेश की आधिकारिक घोषणा कर दी है।

“जहाँ संस्कार दृष्टि को आकार देते हैं और सपनों को साकार करते हैं।”

मूल्य आधारित आधुनिक शिक्षा और नैतिक सिद्धांतों के समन्वय के लिए विख्यात इस विश्वविद्यालय का परिसर पूरी तरह से हरित, सुरक्षित और अत्याधुनिक सुविधाओं से संपन्न है। यहाँ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

🎓 उपलब्ध प्रमुख पाठ्यक्रम (Programs Offered)

BA B.Com B.Sc BNYS MA M.Sc Ph.D. 📜 सर्टिफिकेट कोर्स 📜 डिप्लोमा कोर्स

🌟 विश्वविद्यालय की मुख्य विशेषताएँ

  • मूल्य आधारित शिक्षा: संस्कारों के साथ आधुनिक शिक्षण।
  • समग्र विकास: छात्र-केंद्रित एवं करियर उन्मुख दृष्टिकोण।
  • वैश्विक दृष्टिकोण: हरित एवं सतत पर्यावरण अनुकूल परिसर।

🏫 विश्वस्तरीय सुविधाएँ (Facilities)

  • 📚 विशाल एवं समृद्ध पुस्तकालय
  • 🌸 सुंदर उद्यान और ध्यान केंद्र
  • 🌱 प्राकृतिक चिकित्सा एवं वेलनेस सेंटर
  • 🍽️ आधुनिक कैंटीन एवं जिम सुविधा

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📩 Email: jvbiladnun@gmail.com
📞 Phone: 01581-226110
🌐 Website: www.jvb.ac.in

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शनिवार, मई 16, 2026

अणुव्रत ही ज्ञान का व्यावहारिक रूप: मुनिश्री उदित कुमार

अणुव्रत ही ज्ञान का व्यावहारिक रूप: मुनिश्री उदित कुमार

IIPA में 'भारतीय ज्ञान परंपरा और अणुव्रत' पर संगोष्ठी: पूर्व सचिव अतुल तिवारी और प्रो. गिरीश्वर मिश्र सहित कई दिग्गज रहे उपस्थित



चित्र: भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) में आयोजित संगोष्ठी के मुख्य मुख्य अंश एवं उपस्थित प्रबुद्ध जन।

नई दिल्ली, 16 मई 2026: भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) में आज 'Indian Knowledge System and Anuvrat' (भारतीय ज्ञान परंपरा और अणुव्रत) विषय पर एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम में मुख्य आकर्षण और आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में बहुश्रुत मुनिश्री उदित कुमार जी उपस्थित रहे, जिन्होंने अपने प्रेरणादायी विचारों से पूरी सभा को नई दिशा दी।

कार्यक्रम का शुभारंभ अणुव्रत समिति द्वारा गाए गए मंगल गीत से हुआ। इसके पश्चात अणुव्रत समिति, दिल्ली के अध्यक्ष श्री बाबूलाल गोलछा ने स्वागत वक्तव्य देकर सभी अतिथियों का अभिनंदन किया।

ज्ञान को जीवन में उतारना ही अणुव्रत

संगोष्ठी को संबोधित करते हुए बहुश्रुत मुनिश्री उदित कुमार जी ने भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) और अणुव्रत के गहरे अंतर्संबंधों को रेखांकित किया। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा:

"भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ग्रंथों या दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक व्यावहारिक कला है। जब हम इस महान ज्ञान को अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे संकल्पों के माध्यम से उतारते हैं, तो वही अणुव्रत का रूप ले लेता है। आज के वैश्विक पर्यावरण संकट और मानसिक तनाव का एकमात्र समाधान हमारे इसी आत्म-अनुशासन और संयम में छुपा है।"

दिग्गजों ने रखे अपने विचार

कार्यक्रम में उपस्थित अन्य शीर्ष विचारकों ने भी इस विषय के व्यावहारिक आयामों पर अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए:

  • श्री अतुल कुमार तिवारी, IAS (पूर्व सचिव, स्किल इंडिया - मुख्य अतिथि): उन्होंने कौशल और ज्ञान के साथ नैतिक मूल्यों के जुड़ाव पर विशेष बल दिया।
  • प्रो. गिरीश्वर मिश्र (पूर्व कुलपति, MGAHV): उन्होंने भारतीय चिंतन की प्रासंगिकता को आज के आधुनिक संदर्भ में विस्तार से समझाया।
  • प्रो. सुधा सिंह (विभागाध्यक्ष हिंदी, दिल्ली विश्वविद्यालय): उन्होंने साहित्य और समाज में अणुव्रत के सिद्धांतों की उपयोगिता को रेखांकित किया।
  • श्री अमिताभ रंजन (रजिस्ट्रार, IIPA): उन्होंने प्रशासनिक क्षेत्र में संयम, शुचिता और अनुशासन के महत्व को सराहा।

राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण में उपयोगी

कार्यक्रम का सफल संयोजन श्री अनिल धर मिश्रा द्वारा किया गया। उन्होंने मुनिश्री के पावन विचारों और विद्वानों के इस वैचारिक मंथन को बेहद ऊर्जावान और सामयिक बताते हुए कहा कि यह मंथन भविष्य में देश की राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण के लिए अत्यंत उपयोगी और मार्गदर्शक साबित होगा।

शुक्रवार, मई 15, 2026

लाडनूँ में सजेगा ‘डिजिटल डिटॉक्स’ का महासंगम ; आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में विद्यार्थी सीखेंगे संयमित जीवन के गुर

लाडनूँ में सजेगा ‘डिजिटल डिटॉक्स’ का महासंगम ; आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में विद्यार्थी सीखेंगे संयमित जीवन के गुर
📍 लाडनूँ (राजस्थान) | दिनांक: 18, 19 व 20 मई

"मोबाइल की लत छोड़, आत्मसंयम से जुड़ेंगे विद्यार्थी; अणुविभा की नई पीढ़ी को स्क्रीन एडिक्शन से मुक्त करने की अनूठी पहल।"

लाडनूँ। डिजिटल युग की सबसे बड़ी चुनौती बन चुके 'स्क्रीन एडिक्शन' से नई पीढ़ी को मुक्त करने के लिए अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी (अणुविभा) ने एक निर्णायक और ऐतिहासिक पहल की है। अणुव्रत अनुशास्ता परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन गरिमामयी उपस्थिति में आगामी 18, 19 एवं 20 मई को जैन विश्व भारती परिसर, लाडनूँ में तीन दिवसीय “अणुव्रत डिजिटल डिटॉक्स (ADD) वर्कशॉप” का भव्य आयोजन होने जा रहा है।

अणुविभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रकल्प प्रभारी विनोद कोठारी ने बताया कि अणुव्रत के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि श्री मनन कुमार जी के पावन मार्गदर्शन तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रताप सिंह दूगड़ एवं महामंत्री मनोज सिंघवी के कुशल नेतृत्व में यह कार्यशाला विद्यालयी छात्रों (कक्षा 6 से 12) के लिए विशेष रूप से डिजाइन की गई है। इसका उद्देश्य केवल मोबाइल छुड़वाना नहीं बल्कि विद्यार्थियों में आत्मसंयम, सकारात्मक सोच और अनुशासित जीवनशैली के बीज बोना है।

🎯 कार्यशाला के मुख्य आकर्षण (ADD Highlights)

अणुव्रत डिजिटल डिटॉक्स (ADD) के राष्ट्रीय संयोजक रोशन सुराणा ने तकनीकी जानकारी देते हुए बताया कि यह तीन दिवसीय आयोजन पूरी तरह प्रयोगात्मक होगा। कार्यशाला के मुख्य स्तंभ निम्न रहेंगे:

📱 डिजिटल अनुशासन: स्क्रीन टाइम को आसानी से मैनेज करने की आधुनिक व व्यावहारिक तकनीक।
🧠 माइंड पावर: अवचेतन मन की असीम और सुप्त शक्तियों को जाग्रत करना।
🧘‍♂️ इनर पीस: योग, प्राणायाम और प्रेक्षाध्यान के माध्यम से मानसिक एकाग्रता का विकास।

🎤 विषय विशेषज्ञ एवं मार्गदर्शक सत्र

राष्ट्रीय प्रचार-प्रसार मंत्री पंकज दुधोडिया ने बताया कि आध्यात्मिक मार्गदर्शन हेतु पूज्य साधु-साध्वी एवं समणीवृंद उपस्थित रहेंगे। वहीं विषय विशेषज्ञ चिराग पामेचा, महावीर भटेवरा एवं अंबिका डागा डिजिटल एडिक्शन पर महत्वपूर्ण सत्र लेंगे। 20 मई का दिन बालिकाओं के लिए विशेष रहेगा, जिसमें गरिमा ऋषभ डाकलिया प्रेरक संबोधन देंगी। योग एवं जीवन विज्ञान का जिम्मा हनुमान शर्मा संभालेंगे।

तैयारियाँ जोरों पर: इस कार्यशाला को सफल बनाने के लिए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व योगक्षेम वर्ष की राष्ट्रीय संयोजिका डॉ. कुसुम लुनिया, अणुव्रत समिति लाडनूँ अध्यक्ष शांतिलाल बैद, मंत्री राज कोचर, संगठन मंत्री नवीन नाहटा सहित अणुविभा / अणुव्रत समिति लाडनूँ की पूरी टीम पूरे उत्साह के साथ जुटी हुई है।
टैग्स: Anuvrat Digital Detox | Anuvibha | Anuvrat Anushasta Acharya Mahashraman | Ladnun News | Screen Addiction Solution
गुरुवार, जनवरी 01, 2026

तपस्वी मुनिश्री अमीचंद जी स्वामी जीवन परिचय श्रृंखला 1

ॐ  अ .भी .रा .शि.  को .नमः

तपस्वी मुनिश्री अमीचंद जी स्वामी जीवन  परिचय
श्रृंखला ( 1 ) दिनांक 2 अप्रैल 2020

उनका जन्म मेवाड़ " गलुँड " गांव के आंचलिया परिवार में हुआ । वे भरा पूरा समृद्ध कुटुंब, पत्नी -पुत्र छोड़ दीक्षित हुए। उनका दीक्षा संस्कार मुनि श्री हेमराज जी स्वामी के हाथों लावा सरदारगढ़ में विक्रम सम्वत 1873 मृगसर कृष्णा 6 को संपन्न हुआ। वे जपी- तपी- ध्यानी -अभिग्रही और प्रशांत संत थे। उनकी व्यवहारिकता, वचनमाधुर्य, चातुर्य और सेवा ने सहगामियों के मनो को जीत लिया ।उनकी तपस्या में विशेषता थी -समत्व की साधना । वे केवल भूखे प्यासे रहकर जिहृइंद्रिय- विजयी ही नहीं थे, शीतकाल में जहां राजस्थान की धरती में आदमी कांपने लगता है, कपड़े ओढ़ने के बाद भी कंप-कम्पी नहीं मिटती, वहां तपस्वी अमीचंद जी उत्तरीय पछेवङी- वस्त्र हटाकर, दरवाजे के सामने खड़े हो ,एक- एक प्रहर तक पिछली रात को अभिग्रह संकल्प के साथ खड़े- खड़े ध्यान जाप करते ।उष्ण काल में धूप आतापना लेते । सूर्य तापी तपते । गरम-गरम पत्थर शिला -पट पर लेट कर ध्यान योग साधते। यह सब वे स्वेच्छा सहिष्णुता के अभ्यास में किया करते । वर्षा काल में उनकी तपस्या का क्रम रहता दंस- मंस- परिषह- विजय ' । वे शरीर पर बैठे किसी मक्खी - मच्छर- चींटी आदि को नहीं हटाते  ।समत्व की साधना करते ।  चिंतन करते - यह कष्ट मेरे को होता है या शरीर को  ? क्या मैं शरीर हूं  ? मैं भिन्न हूं  , शरीर भिन्न है  । देखें, कैसे भिन्न है  ?  बस इस चिंतन योग में वे तप: प्रयोग करते ।

 महातपस्वी मुनि श्री अमीचंद जी स्वामी के बारे में श्रीमद् जयाचार्य  श्री क्या लिखते हैं जानने के लिए अगली पोस्ट में.........
क्रमश...

👉🏻मुनि श्री सागरमल जी स्वामी द्वारा लिखित पुस्तक
"जय जय जय महाराज" से साभार

 लिखने में किसी भी प्रकार की त्रुटि रही हो तो मिच्छामि दुक्कड़म🙏🏻

जैन स्मारक ' चुरू (राजस्थान) के फेसबुक पेज के जुडने के लिए लिंक का उपयोग करें |

https://www.facebook.com/groups/2088461091455165/

साभार : अभातेयुप जैन तेरापंथ न्यूज
शुक्रवार, दिसंबर 26, 2025

व्यक्तित्व विकास के सुनहरे सूत्र


यह आलेख मुख्य नियोजिका साध्वी विश्रुतविभा जी द्वारा 01 नवंबर 2020 को 'भिक्षु सभागार' में दिए गए प्रवचन पर आधारित है। इस प्रवचन का मुख्य विषय "व्यक्तित्व विकास के सुनहरे सूत्र" है।

व्यक्तित्व विकास के सुनहरे सूत्र

प्रस्तावना: जीवन की अभिलाषा

संसार के सभी जीव जीने की इच्छा रखते हैं; मृत्यु का वरण कोई नहीं करना चाहता। जैसा कि भगवान महावीर ने दशवैकालिक सूत्र में कहा है—"सब्बे जीवा इच्छंति जीविउं न मरिज्जिउं"। वेदों में भी 100 वर्ष तक स्वस्थ जीने, सुनने और देखने की कामना की गई है। प्रश्न यह है कि यह जीवन कैसा हो? हर व्यक्ति चाहता है कि उसका व्यक्तित्व आकर्षक हो और उसकी सराहना की जाए।

1. व्यक्तित्व का आधार: धन नहीं, व्यवहार

​अक्सर लोग मानते हैं कि अधिक धन से व्यक्तित्व प्रभावशाली बनता है, परंतु यह सत्य नहीं है। आदरणीया मुख्य नियोजिका जी ने दो बहनों के उदाहरण से इसे स्पष्ट किया:

  • ​एक धनाढ्य युवती जिसके पास महंगी ज्वेलरी और फोन है, यदि वह किसी से अहंकारपूर्वक बात करती है, तो उसका व्यक्तित्व आकर्षक नहीं लगेगा [13:00]।
  • ​वहीं एक सामान्य युवती जो शालीनता और विनम्रता से बात करती है, उसे हर कोई सम्मान देता है। अतः व्यक्तित्व का वास्तविक आधार हमारा व्यवहार है, धन नहीं [14:16]।

2. व्यक्तित्व के प्रकार

​मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्तित्व के मुख्य रूप इस प्रकार हैं:

  • बाह्य व्यक्तित्व (Extrovert): रहन-सहन, खान-पान और वातावरण पर आधारित।
  • आंतरिक व्यक्तित्व (Introvert): यह दो प्रकार का होता है। एक कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) पर आधारित, जो किसी को प्रिय नहीं लगता। दूसरा गुणों (करुणा, प्रेम, ईमानदारी, सेवा) पर आधारित, जो हर किसी को आकर्षित करता है [17:15]।
  • तेजस्वी व्यक्तित्व (Brightening Personality): वह व्यक्तित्व जो गुणों के कारण दमकता है।

3. व्यक्तित्व निर्माण: एक दीर्घकालिक साधना

​एक चीनी कहावत के अनुसार, भवन निर्माण में एक वर्ष और वृक्ष लगाने में दस वर्ष लगते हैं, परंतु एक व्यक्ति के निर्माण में सौ वर्ष (पूरा जीवन) लग सकते हैं। यह कार्य श्रमसाध्य है [22:44]। आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ जी ने इसी दिशा में कार्य करते हुए ऐसे साधु और श्रावक तैयार किए जो संघ की निस्वार्थ सेवा कर सकें [23:46]।

4. भगवान महावीर के 'व्यक्तित्व विकास' के सूत्र

​आधुनिक 'पर्सनालिटी डेवलपमेंट' की कक्षाएं आज शुल्क लेकर जो सिखाती हैं, वह भगवान महावीर ने सदियों पहले मेघ कुमार को संयम के रूप में सिखाया था [26:43]:

  • संयमपूर्वक चलना (जयं चरे): अहिंसक दृष्टि रखकर चलना। चलते समय मन विचारों से खाली हो और ध्यान केवल गमन पर हो [29:11]।
  • संयमपूर्वक खड़े रहना (जयं चिट्ठे): खड़े होने का पोस्चर सही हो। केवल गर्दन मोड़ने के बजाय पूरे शरीर को मोड़कर देखना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उत्तम है [30:51]।
  • संयमपूर्वक सोना (जयं सये): सोने में भी जागरूकता हो ताकि किसी जीव की हिंसा न हो और शरीर का पोस्चर न बिगड़े [33:09]।
  • संयमपूर्वक खाना (जयं भुंजंतो): केवल स्वाद के लिए नहीं, अपितु स्वास्थ्य के लिए खाना। ऋतु के अनुसार सात्विक भोजन का चयन करना और अपनी जठराग्नि के अनुसार मात्रा का विवेक रखना [36:20]।
  • संयमपूर्वक बोलना (जयं भासंतो): सीमित और प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग। मौन की महत्ता को समझना [38:22]।

5. मौन और वाणी का संयम

​महान व्यक्तित्वों ने मौन को अपनाया है। बर्टन रसेल और उनके मित्र का उदाहरण देते हुए बताया गया कि वे 30 साल तक साथ रहे पर वाणी का अपव्यय नहीं किया [40:58]। वर्तमान में आचार्य महाश्रमण जी भी इसी वाणी संयम के आदर्श हैं, जो अक्सर अपनी मुस्कुराहट या सिर हिलाकर ही उत्तर दे देते हैं, व्यर्थ नहीं बोलते [42:01]।

निष्कर्ष:

यदि हमें अपने व्यक्तित्व को गुणात्मक, आकर्षक और महनीय बनाना है, तो हमें अपनी हर क्रिया—चलने, बैठने, सोने, खाने और बोलने—में संयम के तत्व को जोड़ना होगा [43:12]।

यह आलेख जीवन को गुणों के आधार पर संवारने का एक मार्ग प्रशस्त करता है।