05 September 2010

मनुष्य को मनुष्यत्व का पाठ पढ़ाता है पर्यूषण पर्व

पर्यूषण पर्व बड़े भाग्य से प्राप्त होता हैं, पर्यूषण पर्व से एक ऐसी सूझ आती है, एक ऐसी सद्बुद्धि प्राप्त होती है जिससे हम आठ दिनों तक मोह-माया से विरक्त होकर अपनी अपनी कमियों को दूर कर सकते है तथा परमात्मा की भक्ति में लीन होकर संसार की असारता को भुल जाते है, यह पर्व हमारी धार्मिक प्रवृतियों को बढ़ावा देता हैं। निष्काम भक्ति वह होती है जिसमें कोई कामना न हो अगर हमारी भक्ति में स्वर्ग की कामना है तो भक्ति निष्काम नहीं हो सकती है, वह बंध गई। पर्यूषण पर्व की साधना निष्काम भक्ति का प्रतिक होती है, पर्यूषण भावनाओं के साथ तप-जपकर भक्त भगवान को रिझाने में सफल होते हैं। आठ दिनों के इस पर्व में मनुष्य, नियम, आसन, पाणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग जैसी साधना तप-जप के साथ कर मानव जीवन को सार्थक बनाता है। यह पर्व मनुष्य को मनुष्यत्व का पाठ बढ़ाता हैं। विश्व में आतंकवाद, भ्रष्टाचार, अत्याचार, अधर्म बढ़ता जा रहा है, भाई-भाई के रक्त का प्यासा बनकर संस्कृति व संस्कारों की खिल्ली उड़ा रहा है, मानवता पसीज रही है, आज विश्व को भगवान महावीर की भांति जीते-जगते महापुरुष की जरुरत है जिन्होंने ‘क्षमा विरस्य भुषणम‘ का मंत्र देकर लोगों को अहिसा का पाठ पढ़ाया था। महान पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व में भगवान महावीर के इन्हीं कथनों को चरितार्थ कर दानव भी मानव बनने की कोशिश करता है पर्यूषण पर्व के आठवे दिन सवत्सरी का प्रतिक्रमण कर जिस सहद्धया से मन के वैर को भुलाकर एक मनुष्य दुसरे मनुष्य के प्रति प्रेम का इजहार करता है हकीकत मे पर्यूषण पर्व की महानता व महावीर के संदेश का स्वरुप देखने को मिलता है। पर्यूषण पर्व की आराधना मे जो व्यक्ति लीन हो जाता है, जप-तपकी साधना से, गुरुभगवंतो की निश्रा से मनुष्य तनावों से मुक्त होकर निखर जाता है। पर्यूषण पर्व की साधना से आराधक धर्मानिष्ठ बनकर समाज व धर्म की धरोहर बन जाता है यह पर्व क्षमा, मैत्री, बंधुत्व की भावना को प्रबल कर पारस्परिक प्रेम व सद्भावना का माहोल निर्मित करता हैं।

मानव की सोई हुई अन्तर्चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को सम्बल देने पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व का आगमन होता है यह पर्व धर्म के साथ राष्ट्रीय एकता तथा मानव धर्म का पाठ पढ़ाता है यह पर्व हमे सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना अनिवार्य हैं। भगवान भक्त की भक्ति को देखता है उसकी अमीरी-गरीबी या सुख समृद्धि को नहीं भक्त अगर भगवान से प्रेम करे तो दुःख कभी आये ही नहीं इतनी सार्थक बातों का ज्ञान महान पर्यूषण पर्व देता है। जैन शासन का यह पर्व हर दृष्टीकोण से गर्व करने लायक है क्योंकि इस दरम्यान गुरु भगवंतो के मुखारविद से अमृतवाणी का श्रवण होता हैं जो हमारे जीवन में ज्ञान व धर्म के बिज बोता हैं। भौतिक संपत्ति से मानव का मन चंचल व अशांत हो जाता है। मनुष्य योनि में आकर भी जब व्यक्ति भौतिक सुखो के स्वार्थो में लिप्त रहे तो समझ लेना चाहिए उसका मानव जीवन निरर्थक व बेकार है जो मनुष्य भगवान महावीर के सिद्धांतो पर चलकर धर्म का रास्ता अख्तियार कर लेता है परमात्मा उसके हृदय रुपी मंदीर में समा जाता हैं। पर्यूषण पर्व परमात्मा को पाने का सरल मार्ग है। इसलिए इस पर्व पर दुनिया गर्व करती है और इस पर्व पर साधक साधना में रत होकर भौतिकता को त्याग कर त्याग की भावना से सराबोर हो जाता है। मन की कलुषिता को दफनाकर मैत्री-बंधुत्व की भावना से ओतप्रोत होता है क्षमा के सार को आचार और विचार बना मानव इस पर्व से पवित्र बन जाता है। पर्यूषण पर्व की मधुर बेला में प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, आस्था व धर्म की छल-छल धारा प्रवाहित होती है। साधना मे तर मनुष्य का मन शान्त, स्वच्छ, शीतल व निर्मल हो जाता है। पर्यूषण पर्व की पवित्रता से जनमन आच्छांदित होकर जगत का सम्पूर्ण कलमल मिटाने का संकल्प लेता है। वैमनस्य की भावना से मुक्त होकर व्यक्ति वैचारिक शक्तियों को प्रबल बनाकर पुरुसार्थ के कार्यों मे सलग्न हो जाता है।

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