शुक्रवार, दिसंबर 26, 2025

व्यक्तित्व विकास के सुनहरे सूत्र


यह आलेख मुख्य नियोजिका साध्वी विश्रुतविभा जी द्वारा 01 नवंबर 2020 को 'भिक्षु सभागार' में दिए गए प्रवचन पर आधारित है। इस प्रवचन का मुख्य विषय "व्यक्तित्व विकास के सुनहरे सूत्र" है।

व्यक्तित्व विकास के सुनहरे सूत्र

प्रस्तावना: जीवन की अभिलाषा

संसार के सभी जीव जीने की इच्छा रखते हैं; मृत्यु का वरण कोई नहीं करना चाहता। जैसा कि भगवान महावीर ने दशवैकालिक सूत्र में कहा है—"सब्बे जीवा इच्छंति जीविउं न मरिज्जिउं"। वेदों में भी 100 वर्ष तक स्वस्थ जीने, सुनने और देखने की कामना की गई है। प्रश्न यह है कि यह जीवन कैसा हो? हर व्यक्ति चाहता है कि उसका व्यक्तित्व आकर्षक हो और उसकी सराहना की जाए।

1. व्यक्तित्व का आधार: धन नहीं, व्यवहार

​अक्सर लोग मानते हैं कि अधिक धन से व्यक्तित्व प्रभावशाली बनता है, परंतु यह सत्य नहीं है। आदरणीया मुख्य नियोजिका जी ने दो बहनों के उदाहरण से इसे स्पष्ट किया:

  • ​एक धनाढ्य युवती जिसके पास महंगी ज्वेलरी और फोन है, यदि वह किसी से अहंकारपूर्वक बात करती है, तो उसका व्यक्तित्व आकर्षक नहीं लगेगा [13:00]।
  • ​वहीं एक सामान्य युवती जो शालीनता और विनम्रता से बात करती है, उसे हर कोई सम्मान देता है। अतः व्यक्तित्व का वास्तविक आधार हमारा व्यवहार है, धन नहीं [14:16]।

2. व्यक्तित्व के प्रकार

​मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्तित्व के मुख्य रूप इस प्रकार हैं:

  • बाह्य व्यक्तित्व (Extrovert): रहन-सहन, खान-पान और वातावरण पर आधारित।
  • आंतरिक व्यक्तित्व (Introvert): यह दो प्रकार का होता है। एक कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) पर आधारित, जो किसी को प्रिय नहीं लगता। दूसरा गुणों (करुणा, प्रेम, ईमानदारी, सेवा) पर आधारित, जो हर किसी को आकर्षित करता है [17:15]।
  • तेजस्वी व्यक्तित्व (Brightening Personality): वह व्यक्तित्व जो गुणों के कारण दमकता है।

3. व्यक्तित्व निर्माण: एक दीर्घकालिक साधना

​एक चीनी कहावत के अनुसार, भवन निर्माण में एक वर्ष और वृक्ष लगाने में दस वर्ष लगते हैं, परंतु एक व्यक्ति के निर्माण में सौ वर्ष (पूरा जीवन) लग सकते हैं। यह कार्य श्रमसाध्य है [22:44]। आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ जी ने इसी दिशा में कार्य करते हुए ऐसे साधु और श्रावक तैयार किए जो संघ की निस्वार्थ सेवा कर सकें [23:46]।

4. भगवान महावीर के 'व्यक्तित्व विकास' के सूत्र

​आधुनिक 'पर्सनालिटी डेवलपमेंट' की कक्षाएं आज शुल्क लेकर जो सिखाती हैं, वह भगवान महावीर ने सदियों पहले मेघ कुमार को संयम के रूप में सिखाया था [26:43]:

  • संयमपूर्वक चलना (जयं चरे): अहिंसक दृष्टि रखकर चलना। चलते समय मन विचारों से खाली हो और ध्यान केवल गमन पर हो [29:11]।
  • संयमपूर्वक खड़े रहना (जयं चिट्ठे): खड़े होने का पोस्चर सही हो। केवल गर्दन मोड़ने के बजाय पूरे शरीर को मोड़कर देखना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उत्तम है [30:51]।
  • संयमपूर्वक सोना (जयं सये): सोने में भी जागरूकता हो ताकि किसी जीव की हिंसा न हो और शरीर का पोस्चर न बिगड़े [33:09]।
  • संयमपूर्वक खाना (जयं भुंजंतो): केवल स्वाद के लिए नहीं, अपितु स्वास्थ्य के लिए खाना। ऋतु के अनुसार सात्विक भोजन का चयन करना और अपनी जठराग्नि के अनुसार मात्रा का विवेक रखना [36:20]।
  • संयमपूर्वक बोलना (जयं भासंतो): सीमित और प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग। मौन की महत्ता को समझना [38:22]।

5. मौन और वाणी का संयम

​महान व्यक्तित्वों ने मौन को अपनाया है। बर्टन रसेल और उनके मित्र का उदाहरण देते हुए बताया गया कि वे 30 साल तक साथ रहे पर वाणी का अपव्यय नहीं किया [40:58]। वर्तमान में आचार्य महाश्रमण जी भी इसी वाणी संयम के आदर्श हैं, जो अक्सर अपनी मुस्कुराहट या सिर हिलाकर ही उत्तर दे देते हैं, व्यर्थ नहीं बोलते [42:01]।

निष्कर्ष:

यदि हमें अपने व्यक्तित्व को गुणात्मक, आकर्षक और महनीय बनाना है, तो हमें अपनी हर क्रिया—चलने, बैठने, सोने, खाने और बोलने—में संयम के तत्व को जोड़ना होगा [43:12]।

यह आलेख जीवन को गुणों के आधार पर संवारने का एक मार्ग प्रशस्त करता है।

मंगलवार, जून 03, 2025

अनजान माता-पिता की अनजानी भूल

 


🖋️ अनजान माता-पिता की अनजानी भूल 🖋️

“जब तक जागेंगे, तब तक बहुत देर न हो जाए…”



0 से 2 वर्ष की उम्र — जीवन की नींव, भविष्य की बुनियाद।

पर क्या हम जान रहे हैं कि इसी संवेदनशील समय में प्लास्टिक जैसी अदृश्य विषाक्तता हमारे बच्चों के जीवन में ज़हर घोल रही है?


प्लास्टिक के खिलौने, बोतलें, चम्मच, चुसनी और न जाने कितनी चीज़ें — जिनसे हम अपने शिशु को सुरक्षित समझते हैं, वही उसके स्वास्थ्य, मस्तिष्क विकास और रोग प्रतिरोधक क्षमता को भीतर ही भीतर खोखला कर रही हैं।


यह कोई कल्पना नहीं, अनुसंधान पर आधारित सत्य है।


आज "समय का चक्र" फिर वहीं आ खड़ा हुआ है, जहाँ हमें विरासत की गोद में लौटना होगा — ऑर्गेनिक लकड़ी, ऑर्गेनिक रंग, मिट्टी के खिलौने, कपड़े की गुड़िया, ताँबे-पीतल के बर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की ओर।


यह केवल कहानी नहीं, चेतावनी है।

आइए, हम जागें — औरों को जगाएँ। अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए प्लास्टिक से तौबा करें।


एक निवेदन — इस संदेश को अपने अपनों तक पहुँचाएँ।

स्वस्थ बचपन, सशक्त राष्ट्र की नींव है।


Klappy Toys CEO CA PRANJUL JAIN ने ऑर्गेनिक खिलौनों के क्षेत्र में बहुत बड़ा इनोवेशन किया है .. एक पॉडकास्ट के माध्यम से  CA  प्रांजुल जैन छोटे बच्चों के लिए प्लास्टिक कैसे हानिकारिक है बता रहे है । आप जरूर इस पूरे वीडियो को सुने देखे ।


https://youtu.be/h1ODRoVEpaI?si=rd5YVz93aRvo8NIY


वेबसाईट लिंक

https://klappytoys.com/


गुरुवार, मार्च 13, 2025

ABTYP was awarded the India Book of Records for organizing a blood donation camp for 108 hours continuously

अभातेयुप हुआ लगातार 108 घंटे रक्तदान शिविर करने के लिए India Book of Records से सम्मानित

अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के तत्वावधान में कोलकाता - हावड़ा एवं सबर्बन की समस्त परिषदों द्वारा आयोजित लगातार 108 तक चलने वाले रक्तदान शिविर का आयोजन हुआ । लगातार 108 घंटे चलने वाले इस रक्तदान शिविर के लिए गौरव का पल है क्योंकि इस शिविर को India Book of Records से आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि श्री जिनेश कुमार जी की सानिध्य में सम्मानित किया गया।


India Book of Records सम्मान को सीमा मनिकोट ने अभातेयुप को प्रदान किया। इसे लेने के लिए अभातेयुप एवं तेयुप के प्रतिनिधि मौजूद थे। 


गौरतलब है कि इस कार्यक्रम को सफल करने में यूको बैंक, कमल ललवानी जी, RJ प्रवीण, केंद्रीय संस्थाओं व स्थानीय संस्थाओं के पदाधिकारी / कार्यकर्ताओं का अतुलनीय सहयोग रहा।


indiabookofrecords Website

indiabookofrecords FB

मंगलवार, फ़रवरी 04, 2025

161 वां मर्यादा महोत्सव 2025 का तृतीय दिन


161वें मर्यादा महोत्सव के शिखर दिवस पर तेरापंथ के शिखरपुरुष ने दिया धर्मसंघ को संदेश

साधु-साध्वी व समणीवृंद ने गीत के माध्यम से संघ को किया वर्धापित

साध्वीप्रमुखाजी ने भी जनता को अनुशासन के प्रति किया उत्प्रेरित

अनेक घोषणाओं आदि का साक्षी बना भुज का स्मृतिवन

दीक्षा में उम्र की सीमा को शांतिदूत ने किया समाप्त

04.02.2025, मंगलवार, भुज, कच्छ (गुजरात), भुज का ऐतिहासिक स्मृतिवन परिसर में बने जय मर्यादा समवसरण के विशाल पण्डाल में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के 161वें मर्यादा महोत्सव के त्रिदिवसीय आयोजन का शिखर दिवस। गुजरात के प्रथम मर्यादा महोत्सव के अंतिम दिवस। चतुर्विध धर्मसंघ की विराट उपस्थिति। निर्धारित समय पर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगलवाणी से उच्चरित मंगल महामंत्रोच्चार के साथ भव्य कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। मुनि दिनेशकुमारजी ने जयघोष कराया। जयघोष से पूरा स्मृतिवन गुंजायमान हो रहा था। मुनि दिनेशकुमारजी ने ‘मर्यादा गीत’ का संगान कराया। 


समणीवृंद ने गीत का संगान किया। आज के अवसर पर साध्वीवृंद ने अपनी गीत को प्रस्तुति दी। तदुपरान्त मुनिवृंद ने भी मर्यादा महोत्सव के शिखर दिवस पर गीत के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। गीतों की प्रस्तुति के उपरान्त तेरापंथ धर्मसंघ की नवीं साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को उद्बोधित करते हुए विभिन्न प्रेरणाएं प्रदान कीं। 


मर्यादा महोत्सव के शिखर दिवस पर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान शिखरपुरुष, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि हम धर्म से जुड़े हुए हैं। आज हम एक धर्मसंघ के मर्यादा महोत्सव समारोह से भी जुड़े हुए हैं। भगवान महावीर के इस शासन में अनेक आम्नाय हैं। दिगम्बर हैं, श्वेताम्बर हैं। श्वेताम्बर परंपरा में भी अनेक संप्रदाय हैं, उनमें से एक है तेरापंथ धर्मसंघ। हमारे तेरापंथ धर्मसंघ का संस्थापन वि.सं. 1817 में हुआ था। आज वर्तमान में इस धर्मसंघ को शुरु हुए 264 वर्ष संपन्न हो चुके हैं। हमारे धर्मसंघ के आदि अनुशास्ता भिक्षु स्वामी हुए। वे हमारे धर्मसंघ के पिता हैं और हम सभी उनकी संतानें हैं। उन्होंने धर्मसंघ की स्थापना की और उन्होंने मर्यादाएं भी बनाईं। उनकी एक लिखित मर्यादा पत्र वि.सं. 1859 का प्राप्त होता है। आचार्यश्री ने उस पत्र को दिखाते हुए कहा कि यह पत्र मानों हमारा गणछत्र है। इससे संदर्भित आज का यह मर्यादा महोत्सव आयोजित हो रहा है। मर्यादा महोत्सव का प्रारम्भ प्रज्ञापुरुष श्रीमज्जयाचार्य ने किया था। वि.सं. 1919 में राजस्थान के बालोतरा से हुआ। हमारे धर्मसंघ ने अतीत में दस आचार्यों का शासनकाल देख लिया है। यह मर्यादाओं का महोत्सव है। भारत के संविधान के अनुसार 26 जनवरी भारत का मर्यादा महोत्सव है और हमारे धर्मसंघ का मर्यादा महोत्सव चल रहा है। इसके माध्यम से न्यारा में चतुर्मास करने वाले चारित्रात्माओं को गुरुदर्शन और सेवा में रहने का अवसर मिल जाता है। 


इसमें एक आचार्य के नेतृत्व में रहने की व्यवस्था है। इसमें एक आचार्य का ही विधान है। आचार्य की आज्ञा से ही साधु-साध्वियां विहार-चतुर्मास करते हैं। इस नियम में 265 वर्षों में आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ। हमारे यहां साधु-साध्वियां भी हैं और समणश्रेणी भी हैं। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी के समय इस श्रेणी का प्रारम्भ हुआ है। ये साध्वियां तो नहीं हैं, किन्तु अनेक अंशों में साध्वियों के समान ही हैं। ये वाहन का यथाविधि उपयोग कर सकती हैं। देश-विदेश में जा सकती हैं और धर्म प्रचार कर सकती हैं। आचार्यों की दृष्टि के बिना आज तक कोई चतुर्मास नहीं हुए हैं। जहां आचार्य विहार के लिए कह दें, वहां विहार करने की मर्यादा है। कोई भी साधु-साध्वी अपना-अपना शिष्य-शिष्याएं न बनाएं। कभी-कभी साधु-साध्वी आचार्य की दृष्टि से दीक्षा तो सकते हैं, किन्तु वह शिष्य तो आचार्य का ही होता है। आचार्यश्री भी योग्य व्यक्ति को दीक्षित करते हैं और कोई दीक्षा के बाद भी अयोग्य निकले तो उसे गण से बाहर कर सकते हैं। योग्यता देखकर ही दीक्षा देनी चाहिए। आचार्य अपने गुरुभाई या शिष्य को अपना उत्तराधिकारी चुने तो उसे सभी साधु-साध्वियां सहर्ष स्वीकार करते हैं। पूरे धर्मसंघ में इन पांच मर्यादाओं का सम्यक् और दृढ़ता के साथ पालन हो रहा है। आचार्यश्री ने ‘हमारे भाग्य बड़े बलवान, मिला यह तेरापंथ महान’ गीत का आंशिक संगान किया। 


आचार्यश्री ने आगे कहा कि साधु-साध्वियों रूपी गण को प्रणमन करता हूं। हमारे पूर्वाचार्यों ने मर्यादाओं में विस्तार भी किया है। संन्यास व साधुता के प्रति पूर्ण जागरूकता रहे। हमारे धर्मसंघ में साधु-साध्वियां, समणियां और श्रावक-श्राविकाएं भी हैं। इनके साथ हमारी अनेक संस्थाएं भी हैं। केन्द्रीय हैं और स्थानीय और प्रान्तीय स्तर पर भी होती हैं। कितनी हमारी केन्द्रीय संस्थाएं कितनी अनुशासित और जागरूक होती हैं। जिनका कार्य बहुत व्यवस्थित प्लानिंग, योजना और फिर उसकी क्रियान्विति भी होती हैं। ये संस्थाएं समाज के सौभाग्य की बात है। कल्याण परिषद एक ऐसा मंच है, जहां योजनाओं पर निर्णय होता है और उसका पालन भी होता है। विकास परिषद भी है, वह भी कल्याण परिषद के अंतर्गत ही है। 


समाज की कई गतिविधियां भी बहुत उपयोगी हैं। ज्ञानशाला के माध्यम से छोटे-छोटे बच्चों को धार्मिक ज्ञान देने का बहुत सुन्दर उपक्रम है। महासभा के तत्त्वावधान में चलने वाली इस ज्ञानशाला में सभाएं और फिर अनेक संस्थाएं जुड़ी हुई होती हैं, बहुत अच्छा क्रम देखने को मिल रहा है। ज्ञानशाला और ज्ञानार्थियों की संख्या भी बढ़े तो बालपीढी के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है। 


उपासकश्रेणी भी महासभा के तत्त्वावधान में चल रही है। आज इतने उपासक-उपासिकाएं बन गए हैं। उपासक-उपासिकाओं की संख्या भी बढ़े। पर्युषण में उनका अच्छा उपयोग हो और कभी संथारे की बात हो, जहां साधु-साध्वियां न हों, समणियां न हों तो उपासक-उपासिकाएं संथारा करा सकते हैं अणुव्रत आन्दोलन, प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान जो हमारी गैर संप्रदायिक और लोककल्याणकारी प्रवृत्तियां हैं, जो गुरुदेव तुलसी के समय से चल रही हैं। इनके माध्यम से जन-जन का कल्याण हो सकता है। 


दीक्षा में उम्र संबंधी बाधा हुई समाप्त


161वें मर्यादा महोत्सव के अवसर पर आचार्यश्री महाश्रमणजी ने धर्मसंघ को संबोधित करते हुए कहा कि मैंने पहले पुरुषों की दीक्षा में 50 वर्ष की सीमा लगी हुई थी। उसे आचार्यश्री ने खोलते हुए कहा कि जिस अवस्था के व्यक्ति की दीक्षा की इच्छा होगी, यदि वह हमारी कसौटियों पर खरा उतरेगा, उसे दीक्षा प्रदान की जा सकती है। 


अहमदाबाद चतुर्मास में दीक्षा समारोह की घोषणा


मुमुक्षु कल्प मेहता, मुमुक्षु प्रीत कोठारी, मुमुक्षु मोहक बेताला, मुमुक्षु मनीषा, मुमुक्षु प्रेक्षा, मुमुक्षु राजुल, मुमुक्षु भावना, मुमुक्षु कीर्ति भाद्रव शुक्ला एकादशी 3 सितम्बर 2025 को चतुर्मास स्थल में दीक्षा समारोह के दिन इन आठ मुमुक्षुओं को मुनि व साध्वी दीक्षा देने का भाव है। मुमुक्षु भाविका, मुमुक्षु बिनू, मुमुक्षु अंजलि और मुमुक्षु साधना को उसी दीक्षा समारोह में समणी दीक्षा देने का भाव है। वैरागी श्री मनोज संकलेचा को साधु प्रतिक्रमण सीखने की स्वीकृति प्रदान की। 


स्वरचित गीत का युगप्रधान आचार्यश्री ने किया संगान


मर्यादा महोत्सव के अवसर पर तेरापंथ अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने स्वरचित गीत ‘करें हम आध्यात्मिक उत्थान रे, शुभ ध्यान रे, जैनागम वाङ्मय का’ संगान किया। अपने आराध्य के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने इस गीत का संगान किया। 


मर्यादा पत्र का तेरापंथ के अनुशास्ता ने किया वाचन


गीत संगान के उपरान्त आचार्यश्री ने मर्यादा महोत्सव के आधार ‘मर्यादा पत्र’ का वाचन किया। साधु-साध्वियों ने तन्मयता के साथ उसका अनुश्रवण किया। यह वही मर्यादा पत्र है, जिसकी मर्यादा के आधार पर तेरापंथ शासन का संचालन होता है। राजस्थानी भाषा में लिखित इस मर्यादा पत्र को आचार्यश्री ने वाचन करते हुए चारित्रात्माओं को त्याग भी कराया। 43 साधु और 53 साध्वियां और 43 समणियों की उपस्थिति रही। 


तदुपरान्त विशाल प्रवचन पण्डाल में एक ओर संतवृंद, दूसरी ओर साध्वीवृंद और मध्य में समणीवृंद ने पंक्तिबद्ध होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। तेरापंथ धर्मसंघ की मर्यादा, अनुशासन व व्यवस्था की इस नयनाभिराम दृश्य को देखकर भुज की धरा ही नहीं उपस्थित हजारों नेत्र हर्षान्वित और गौरवान्वित हो रही थीं। उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को आचार्यश्री ने ‘श्रावक निष्ठा पत्र’ का वाचन कराया। जो श्रावक-श्राविकाओं के वाचन से पूरा वातावरण गुंजायमान हो उठा। 


आचार्यश्री ने देश के विभिन्न हिस्सों में साधु-साध्वियों के विहार चतुर्मासों की घोषणा की। साथ ही आचार्यश्री ने विदेशों और देश के अन्य हिस्सों में स्थित श्रावक समाज को लाभान्वित करने के लिए सेण्टर्स व उपकेन्द्र की घोषणा की। 


आचार्यश्री ने आगे प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि तेरापंथ समाज कही भी रहे, कहीं भी जाए, नॉनवेज व शराब आदि के सेवन से बचने का प्रयास करना चाहिए। अपनी निंदा का जवाब अपने अच्छे कार्यों से देने का प्रयास करना चाहिए। संयम के साथ अपना अच्छा कार्य करने का प्रयास करना चाहिए। समाज की संस्थाओं में नैतिकता रखने का प्रयास करना चाहिए। मैत्री और शुद्ध भावना रखना ही धर्म है। दूसरों का कल्याण हो, इसके लिए दूसरों की सेवा का भी प्रयास करना चाहिए। साध्वीप्रमुखाजी, साध्वीवर्याजी और मुख्यमुनि महावीर धर्मसंघ को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। और भी साधु-साध्वियां चाहे गुरुकुलवास में हों या न्यारा में वे अपने कार्यों में ध्यान देते हैं। कई संत बहुत अच्छी सेवा दे रहे हैं। संत कई संस्थाओं के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक के रूप में अपनी सेवा दे रहे हैं। बहुत कर्मठता से अपनी सेवा दे रहे हैं। कई साध्वियां आगम के कार्य और अन्य सेवा के कार्य से जुड़ी हुई हैं। सभी अपने कार्य मंे जुटे रहें। 


आचार्यश्री पट्ट से नीचे खड़े हुए तो अपने आराध्य के साथ चतुर्विध धर्मसंघ खड़ा हुआ और संघगान प्रारम्भ किया। संघगान से पूरा स्मृतिवन गूंज रहा था। इसके साथ ही आचार्यश्री ने भुज-कच्छ में आयोजित 161वें मर्यादा महोत्सव के त्रिदिवसीय समारोह की सम्पन्नता की घोषणा भी की। इस प्रकार ऐतिहासिक भूमि पर तेरापंथ धर्मसंघ का ऐतिहासिक सुसम्पन्न हुआ। 

"तेरापंथ धर्मसंघ का महाकुंभ 161 वाँ मर्यादा महोत्सव" - भुज (कच्छ)- तृतीय दिवस

मर्यादा के शिखर पुरुष युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी द्वारा नमस्कार महामंत्र के समुच्चारण के साथ मर्यादा महोत्सव के तृतीय दिवस के मुख्य कार्यक्रम का हुआ शुभारम्भ

पूज्यप्रवर द्वारा आज होगी साधु - साध्वियों के चातुर्मास क्षेत्र की घोषणाएं


बहुश्रुत परिषद सदस्य मुनिश्री दिनेशकुमारजी द्वारा जय घोष एवं "भीखण जी स्वामी भारी मर्यादा बांधी गीत के संगान के पश्चात समणी वृंद द्वारा "गुरु भुज मां आव्या" गीत की हुई श्रद्धासिक्त प्रस्तुति


मर्यादा महोत्सव के अवसर पर साध्वीवृंद द्वारा "भिक्षु का आसन - भिक्षु का शासन" गीत की हुई श्रद्धासिक्त प्रस्तुति


मर्यादा महोत्सव के अवसर पर मुनिवृन्द द्वारा "विघ्नविनायक मंगलदायक स्वामीजी का जय नारा" गीत की हुई श्रद्धासिक्त प्रस्तुति


मर्यादा महोत्सव के संदर्भ में साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभाजी ने "मर्यादा और अनुशासन" विषय पर किया उपस्थित जन मेदनी को सम्बोधित

जहाँ मर्यादा होती है वहाँ विकास, सफलता और महानता स्वतः आ जाती है : साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभाजी


पूज्य गुरुदेव मर्यादा महोत्सव के अवसर पर चतुर्विध धर्मसंघ को प्रदान कर रहे है प्रेरणा पाथेय

पुज्य गुरुदेव ने आचार्य भिक्षु द्वारा लिखित ऐतिहासिक मर्यादा पत्र को दिखाते हुए मर्यादाओं की महत्ता पर डाला प्रकाश

तेरापंथ में पांच बातों में एकता है । वे है "एक आचार, एक विचार, एक आचार्य, एक विधान और एक सुगुरु  : आचार्य श्री महाश्रमणजी


हमारे संघ में मर्यादा शिरोमणि है । हमारी मुख्य पांच मर्यादाएं है : आचार्य श्री महाश्रमणजी


पुज्य गुरुदेव युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी द्वारा 161 वें मर्यादा महोत्सव के उपलक्ष में सम्मुचरित गीत


परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी ने महत्ती कृपाकर मर्यादा महोत्सव के अवसर पर निम्न लिखित मुमुक्ष भाई बहिनों की दीक्षा दिनांक 3-9-2025, बुधवार, भाद्रव शुक्ला एकादशी को प्रेक्षा विश्व भारती, कोबा (अहमदाबाद) में देने का फरमाया है।


मर्यादा के शिखर पुरुष आचार्य श्री महाश्रमणजी ने आचार्य श्री भिक्षु द्वारा लिखित ऐतिहासिक मर्यादापत्र का किया वांचन । सभी उपस्थित साधु साध्वियों ने मर्यादा पत्र में उल्लेखित संकल्पों का किया उच्चारण।


मर्यादा महोत्सव के अवसर पर हाजरी वांचन का अद्भुत दृश्य देख श्रावक - श्राविका समाज हुआ अभिभूत

पूज्य गुरुदेव द्वारा समुच्चरित मर्यादाओं के लेखपत्र का पंडाल के दोनों ओर पंक्ति बद्ध खड़े साधु - साध्वी वृंद ने पुनः किया उच्चारित


तेरापंथ धर्मसंघ में मर्यादा, अनुशासन और एकता का दिव्य संगम – 161वें मर्यादा महोत्सव के महाकुंभ का तृतीय दिवस उल्लासपूर्वक संपन्न