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यह आलेख मुख्य नियोजिका साध्वी विश्रुतविभा जी द्वारा 01 नवंबर 2020 को 'भिक्षु सभागार' में दिए गए प्रवचन पर आधारित है। इस प्रवचन का मुख्य विषय "व्यक्तित्व विकास के सुनहरे सूत्र" है।
प्रस्तावना: जीवन की अभिलाषा
संसार के सभी जीव जीने की इच्छा रखते हैं; मृत्यु का वरण कोई नहीं करना चाहता। जैसा कि भगवान महावीर ने दशवैकालिक सूत्र में कहा है—"सब्बे जीवा इच्छंति जीविउं न मरिज्जिउं"। वेदों में भी 100 वर्ष तक स्वस्थ जीने, सुनने और देखने की कामना की गई है। प्रश्न यह है कि यह जीवन कैसा हो? हर व्यक्ति चाहता है कि उसका व्यक्तित्व आकर्षक हो और उसकी सराहना की जाए।
1. व्यक्तित्व का आधार: धन नहीं, व्यवहार
अक्सर लोग मानते हैं कि अधिक धन से व्यक्तित्व प्रभावशाली बनता है, परंतु यह सत्य नहीं है। आदरणीया मुख्य नियोजिका जी ने दो बहनों के उदाहरण से इसे स्पष्ट किया:
2. व्यक्तित्व के प्रकार
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्तित्व के मुख्य रूप इस प्रकार हैं:
3. व्यक्तित्व निर्माण: एक दीर्घकालिक साधना
एक चीनी कहावत के अनुसार, भवन निर्माण में एक वर्ष और वृक्ष लगाने में दस वर्ष लगते हैं, परंतु एक व्यक्ति के निर्माण में सौ वर्ष (पूरा जीवन) लग सकते हैं। यह कार्य श्रमसाध्य है [22:44]। आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ जी ने इसी दिशा में कार्य करते हुए ऐसे साधु और श्रावक तैयार किए जो संघ की निस्वार्थ सेवा कर सकें [23:46]।
4. भगवान महावीर के 'व्यक्तित्व विकास' के सूत्र
आधुनिक 'पर्सनालिटी डेवलपमेंट' की कक्षाएं आज शुल्क लेकर जो सिखाती हैं, वह भगवान महावीर ने सदियों पहले मेघ कुमार को संयम के रूप में सिखाया था [26:43]:
5. मौन और वाणी का संयम
महान व्यक्तित्वों ने मौन को अपनाया है। बर्टन रसेल और उनके मित्र का उदाहरण देते हुए बताया गया कि वे 30 साल तक साथ रहे पर वाणी का अपव्यय नहीं किया [40:58]। वर्तमान में आचार्य महाश्रमण जी भी इसी वाणी संयम के आदर्श हैं, जो अक्सर अपनी मुस्कुराहट या सिर हिलाकर ही उत्तर दे देते हैं, व्यर्थ नहीं बोलते [42:01]।
निष्कर्ष:
यदि हमें अपने व्यक्तित्व को गुणात्मक, आकर्षक और महनीय बनाना है, तो हमें अपनी हर क्रिया—चलने, बैठने, सोने, खाने और बोलने—में संयम के तत्व को जोड़ना होगा [43:12]।
यह आलेख जीवन को गुणों के आधार पर संवारने का एक मार्ग प्रशस्त करता है।
🖋️ अनजान माता-पिता की अनजानी भूल 🖋️
“जब तक जागेंगे, तब तक बहुत देर न हो जाए…”
0 से 2 वर्ष की उम्र — जीवन की नींव, भविष्य की बुनियाद।
पर क्या हम जान रहे हैं कि इसी संवेदनशील समय में प्लास्टिक जैसी अदृश्य विषाक्तता हमारे बच्चों के जीवन में ज़हर घोल रही है?
प्लास्टिक के खिलौने, बोतलें, चम्मच, चुसनी और न जाने कितनी चीज़ें — जिनसे हम अपने शिशु को सुरक्षित समझते हैं, वही उसके स्वास्थ्य, मस्तिष्क विकास और रोग प्रतिरोधक क्षमता को भीतर ही भीतर खोखला कर रही हैं।
यह कोई कल्पना नहीं, अनुसंधान पर आधारित सत्य है।
आज "समय का चक्र" फिर वहीं आ खड़ा हुआ है, जहाँ हमें विरासत की गोद में लौटना होगा — ऑर्गेनिक लकड़ी, ऑर्गेनिक रंग, मिट्टी के खिलौने, कपड़े की गुड़िया, ताँबे-पीतल के बर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की ओर।
यह केवल कहानी नहीं, चेतावनी है।
आइए, हम जागें — औरों को जगाएँ। अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए प्लास्टिक से तौबा करें।
एक निवेदन — इस संदेश को अपने अपनों तक पहुँचाएँ।
स्वस्थ बचपन, सशक्त राष्ट्र की नींव है।
Klappy Toys CEO CA PRANJUL JAIN ने ऑर्गेनिक खिलौनों के क्षेत्र में बहुत बड़ा इनोवेशन किया है .. एक पॉडकास्ट के माध्यम से CA प्रांजुल जैन छोटे बच्चों के लिए प्लास्टिक कैसे हानिकारिक है बता रहे है । आप जरूर इस पूरे वीडियो को सुने देखे ।
https://youtu.be/h1ODRoVEpaI?si=rd5YVz93aRvo8NIY
वेबसाईट लिंक
अभातेयुप हुआ लगातार 108 घंटे रक्तदान शिविर करने के लिए India Book of Records से सम्मानित
अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के तत्वावधान में कोलकाता - हावड़ा एवं सबर्बन की समस्त परिषदों द्वारा आयोजित लगातार 108 तक चलने वाले रक्तदान शिविर का आयोजन हुआ । लगातार 108 घंटे चलने वाले इस रक्तदान शिविर के लिए गौरव का पल है क्योंकि इस शिविर को India Book of Records से आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि श्री जिनेश कुमार जी की सानिध्य में सम्मानित किया गया।
India Book of Records सम्मान को सीमा मनिकोट ने अभातेयुप को प्रदान किया। इसे लेने के लिए अभातेयुप एवं तेयुप के प्रतिनिधि मौजूद थे।
गौरतलब है कि इस कार्यक्रम को सफल करने में यूको बैंक, कमल ललवानी जी, RJ प्रवीण, केंद्रीय संस्थाओं व स्थानीय संस्थाओं के पदाधिकारी / कार्यकर्ताओं का अतुलनीय सहयोग रहा।
161वें मर्यादा महोत्सव के शिखर दिवस पर तेरापंथ के शिखरपुरुष ने दिया धर्मसंघ को संदेश
साधु-साध्वी व समणीवृंद ने गीत के माध्यम से संघ को किया वर्धापित
साध्वीप्रमुखाजी ने भी जनता को अनुशासन के प्रति किया उत्प्रेरित
अनेक घोषणाओं आदि का साक्षी बना भुज का स्मृतिवन
दीक्षा में उम्र की सीमा को शांतिदूत ने किया समाप्त
04.02.2025, मंगलवार, भुज, कच्छ (गुजरात), भुज का ऐतिहासिक स्मृतिवन परिसर में बने जय मर्यादा समवसरण के विशाल पण्डाल में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के 161वें मर्यादा महोत्सव के त्रिदिवसीय आयोजन का शिखर दिवस। गुजरात के प्रथम मर्यादा महोत्सव के अंतिम दिवस। चतुर्विध धर्मसंघ की विराट उपस्थिति। निर्धारित समय पर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगलवाणी से उच्चरित मंगल महामंत्रोच्चार के साथ भव्य कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। मुनि दिनेशकुमारजी ने जयघोष कराया। जयघोष से पूरा स्मृतिवन गुंजायमान हो रहा था। मुनि दिनेशकुमारजी ने ‘मर्यादा गीत’ का संगान कराया।
समणीवृंद ने गीत का संगान किया। आज के अवसर पर साध्वीवृंद ने अपनी गीत को प्रस्तुति दी। तदुपरान्त मुनिवृंद ने भी मर्यादा महोत्सव के शिखर दिवस पर गीत के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। गीतों की प्रस्तुति के उपरान्त तेरापंथ धर्मसंघ की नवीं साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को उद्बोधित करते हुए विभिन्न प्रेरणाएं प्रदान कीं।
मर्यादा महोत्सव के शिखर दिवस पर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान शिखरपुरुष, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि हम धर्म से जुड़े हुए हैं। आज हम एक धर्मसंघ के मर्यादा महोत्सव समारोह से भी जुड़े हुए हैं। भगवान महावीर के इस शासन में अनेक आम्नाय हैं। दिगम्बर हैं, श्वेताम्बर हैं। श्वेताम्बर परंपरा में भी अनेक संप्रदाय हैं, उनमें से एक है तेरापंथ धर्मसंघ। हमारे तेरापंथ धर्मसंघ का संस्थापन वि.सं. 1817 में हुआ था। आज वर्तमान में इस धर्मसंघ को शुरु हुए 264 वर्ष संपन्न हो चुके हैं। हमारे धर्मसंघ के आदि अनुशास्ता भिक्षु स्वामी हुए। वे हमारे धर्मसंघ के पिता हैं और हम सभी उनकी संतानें हैं। उन्होंने धर्मसंघ की स्थापना की और उन्होंने मर्यादाएं भी बनाईं। उनकी एक लिखित मर्यादा पत्र वि.सं. 1859 का प्राप्त होता है। आचार्यश्री ने उस पत्र को दिखाते हुए कहा कि यह पत्र मानों हमारा गणछत्र है। इससे संदर्भित आज का यह मर्यादा महोत्सव आयोजित हो रहा है। मर्यादा महोत्सव का प्रारम्भ प्रज्ञापुरुष श्रीमज्जयाचार्य ने किया था। वि.सं. 1919 में राजस्थान के बालोतरा से हुआ। हमारे धर्मसंघ ने अतीत में दस आचार्यों का शासनकाल देख लिया है। यह मर्यादाओं का महोत्सव है। भारत के संविधान के अनुसार 26 जनवरी भारत का मर्यादा महोत्सव है और हमारे धर्मसंघ का मर्यादा महोत्सव चल रहा है। इसके माध्यम से न्यारा में चतुर्मास करने वाले चारित्रात्माओं को गुरुदर्शन और सेवा में रहने का अवसर मिल जाता है।
इसमें एक आचार्य के नेतृत्व में रहने की व्यवस्था है। इसमें एक आचार्य का ही विधान है। आचार्य की आज्ञा से ही साधु-साध्वियां विहार-चतुर्मास करते हैं। इस नियम में 265 वर्षों में आज तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ। हमारे यहां साधु-साध्वियां भी हैं और समणश्रेणी भी हैं। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी के समय इस श्रेणी का प्रारम्भ हुआ है। ये साध्वियां तो नहीं हैं, किन्तु अनेक अंशों में साध्वियों के समान ही हैं। ये वाहन का यथाविधि उपयोग कर सकती हैं। देश-विदेश में जा सकती हैं और धर्म प्रचार कर सकती हैं। आचार्यों की दृष्टि के बिना आज तक कोई चतुर्मास नहीं हुए हैं। जहां आचार्य विहार के लिए कह दें, वहां विहार करने की मर्यादा है। कोई भी साधु-साध्वी अपना-अपना शिष्य-शिष्याएं न बनाएं। कभी-कभी साधु-साध्वी आचार्य की दृष्टि से दीक्षा तो सकते हैं, किन्तु वह शिष्य तो आचार्य का ही होता है। आचार्यश्री भी योग्य व्यक्ति को दीक्षित करते हैं और कोई दीक्षा के बाद भी अयोग्य निकले तो उसे गण से बाहर कर सकते हैं। योग्यता देखकर ही दीक्षा देनी चाहिए। आचार्य अपने गुरुभाई या शिष्य को अपना उत्तराधिकारी चुने तो उसे सभी साधु-साध्वियां सहर्ष स्वीकार करते हैं। पूरे धर्मसंघ में इन पांच मर्यादाओं का सम्यक् और दृढ़ता के साथ पालन हो रहा है। आचार्यश्री ने ‘हमारे भाग्य बड़े बलवान, मिला यह तेरापंथ महान’ गीत का आंशिक संगान किया।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि साधु-साध्वियों रूपी गण को प्रणमन करता हूं। हमारे पूर्वाचार्यों ने मर्यादाओं में विस्तार भी किया है। संन्यास व साधुता के प्रति पूर्ण जागरूकता रहे। हमारे धर्मसंघ में साधु-साध्वियां, समणियां और श्रावक-श्राविकाएं भी हैं। इनके साथ हमारी अनेक संस्थाएं भी हैं। केन्द्रीय हैं और स्थानीय और प्रान्तीय स्तर पर भी होती हैं। कितनी हमारी केन्द्रीय संस्थाएं कितनी अनुशासित और जागरूक होती हैं। जिनका कार्य बहुत व्यवस्थित प्लानिंग, योजना और फिर उसकी क्रियान्विति भी होती हैं। ये संस्थाएं समाज के सौभाग्य की बात है। कल्याण परिषद एक ऐसा मंच है, जहां योजनाओं पर निर्णय होता है और उसका पालन भी होता है। विकास परिषद भी है, वह भी कल्याण परिषद के अंतर्गत ही है।
समाज की कई गतिविधियां भी बहुत उपयोगी हैं। ज्ञानशाला के माध्यम से छोटे-छोटे बच्चों को धार्मिक ज्ञान देने का बहुत सुन्दर उपक्रम है। महासभा के तत्त्वावधान में चलने वाली इस ज्ञानशाला में सभाएं और फिर अनेक संस्थाएं जुड़ी हुई होती हैं, बहुत अच्छा क्रम देखने को मिल रहा है। ज्ञानशाला और ज्ञानार्थियों की संख्या भी बढ़े तो बालपीढी के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है।
उपासकश्रेणी भी महासभा के तत्त्वावधान में चल रही है। आज इतने उपासक-उपासिकाएं बन गए हैं। उपासक-उपासिकाओं की संख्या भी बढ़े। पर्युषण में उनका अच्छा उपयोग हो और कभी संथारे की बात हो, जहां साधु-साध्वियां न हों, समणियां न हों तो उपासक-उपासिकाएं संथारा करा सकते हैं अणुव्रत आन्दोलन, प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान जो हमारी गैर संप्रदायिक और लोककल्याणकारी प्रवृत्तियां हैं, जो गुरुदेव तुलसी के समय से चल रही हैं। इनके माध्यम से जन-जन का कल्याण हो सकता है।
दीक्षा में उम्र संबंधी बाधा हुई समाप्त
161वें मर्यादा महोत्सव के अवसर पर आचार्यश्री महाश्रमणजी ने धर्मसंघ को संबोधित करते हुए कहा कि मैंने पहले पुरुषों की दीक्षा में 50 वर्ष की सीमा लगी हुई थी। उसे आचार्यश्री ने खोलते हुए कहा कि जिस अवस्था के व्यक्ति की दीक्षा की इच्छा होगी, यदि वह हमारी कसौटियों पर खरा उतरेगा, उसे दीक्षा प्रदान की जा सकती है।
अहमदाबाद चतुर्मास में दीक्षा समारोह की घोषणा
मुमुक्षु कल्प मेहता, मुमुक्षु प्रीत कोठारी, मुमुक्षु मोहक बेताला, मुमुक्षु मनीषा, मुमुक्षु प्रेक्षा, मुमुक्षु राजुल, मुमुक्षु भावना, मुमुक्षु कीर्ति भाद्रव शुक्ला एकादशी 3 सितम्बर 2025 को चतुर्मास स्थल में दीक्षा समारोह के दिन इन आठ मुमुक्षुओं को मुनि व साध्वी दीक्षा देने का भाव है। मुमुक्षु भाविका, मुमुक्षु बिनू, मुमुक्षु अंजलि और मुमुक्षु साधना को उसी दीक्षा समारोह में समणी दीक्षा देने का भाव है। वैरागी श्री मनोज संकलेचा को साधु प्रतिक्रमण सीखने की स्वीकृति प्रदान की।
स्वरचित गीत का युगप्रधान आचार्यश्री ने किया संगान
मर्यादा महोत्सव के अवसर पर तेरापंथ अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने स्वरचित गीत ‘करें हम आध्यात्मिक उत्थान रे, शुभ ध्यान रे, जैनागम वाङ्मय का’ संगान किया। अपने आराध्य के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने इस गीत का संगान किया।
मर्यादा पत्र का तेरापंथ के अनुशास्ता ने किया वाचन
गीत संगान के उपरान्त आचार्यश्री ने मर्यादा महोत्सव के आधार ‘मर्यादा पत्र’ का वाचन किया। साधु-साध्वियों ने तन्मयता के साथ उसका अनुश्रवण किया। यह वही मर्यादा पत्र है, जिसकी मर्यादा के आधार पर तेरापंथ शासन का संचालन होता है। राजस्थानी भाषा में लिखित इस मर्यादा पत्र को आचार्यश्री ने वाचन करते हुए चारित्रात्माओं को त्याग भी कराया। 43 साधु और 53 साध्वियां और 43 समणियों की उपस्थिति रही।
तदुपरान्त विशाल प्रवचन पण्डाल में एक ओर संतवृंद, दूसरी ओर साध्वीवृंद और मध्य में समणीवृंद ने पंक्तिबद्ध होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। तेरापंथ धर्मसंघ की मर्यादा, अनुशासन व व्यवस्था की इस नयनाभिराम दृश्य को देखकर भुज की धरा ही नहीं उपस्थित हजारों नेत्र हर्षान्वित और गौरवान्वित हो रही थीं। उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को आचार्यश्री ने ‘श्रावक निष्ठा पत्र’ का वाचन कराया। जो श्रावक-श्राविकाओं के वाचन से पूरा वातावरण गुंजायमान हो उठा।
आचार्यश्री ने देश के विभिन्न हिस्सों में साधु-साध्वियों के विहार चतुर्मासों की घोषणा की। साथ ही आचार्यश्री ने विदेशों और देश के अन्य हिस्सों में स्थित श्रावक समाज को लाभान्वित करने के लिए सेण्टर्स व उपकेन्द्र की घोषणा की।
आचार्यश्री ने आगे प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि तेरापंथ समाज कही भी रहे, कहीं भी जाए, नॉनवेज व शराब आदि के सेवन से बचने का प्रयास करना चाहिए। अपनी निंदा का जवाब अपने अच्छे कार्यों से देने का प्रयास करना चाहिए। संयम के साथ अपना अच्छा कार्य करने का प्रयास करना चाहिए। समाज की संस्थाओं में नैतिकता रखने का प्रयास करना चाहिए। मैत्री और शुद्ध भावना रखना ही धर्म है। दूसरों का कल्याण हो, इसके लिए दूसरों की सेवा का भी प्रयास करना चाहिए। साध्वीप्रमुखाजी, साध्वीवर्याजी और मुख्यमुनि महावीर धर्मसंघ को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। और भी साधु-साध्वियां चाहे गुरुकुलवास में हों या न्यारा में वे अपने कार्यों में ध्यान देते हैं। कई संत बहुत अच्छी सेवा दे रहे हैं। संत कई संस्थाओं के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक के रूप में अपनी सेवा दे रहे हैं। बहुत कर्मठता से अपनी सेवा दे रहे हैं। कई साध्वियां आगम के कार्य और अन्य सेवा के कार्य से जुड़ी हुई हैं। सभी अपने कार्य मंे जुटे रहें।
आचार्यश्री पट्ट से नीचे खड़े हुए तो अपने आराध्य के साथ चतुर्विध धर्मसंघ खड़ा हुआ और संघगान प्रारम्भ किया। संघगान से पूरा स्मृतिवन गूंज रहा था। इसके साथ ही आचार्यश्री ने भुज-कच्छ में आयोजित 161वें मर्यादा महोत्सव के त्रिदिवसीय समारोह की सम्पन्नता की घोषणा भी की। इस प्रकार ऐतिहासिक भूमि पर तेरापंथ धर्मसंघ का ऐतिहासिक सुसम्पन्न हुआ।
बहुश्रुत मुनिश्री उदित कुमार का उदयपुर में आगमन
तेरापंथ धर्मसंघ का 161 वाँ मर्यादा महोत्सव का शहर के तेरापंथ सभा भवन अणुव्रत चौक में तेरापंथ सभा के तत्वावधान में तेरह साधु-साध्वीयों के सान्निध्य में मुनिवृन्द के नमस्कार महामंत्रोच्चारण के साथ भव्य आगाज हुआ शासन श्री मुनि सुरेश कुमार ने तेरापंथ धर्मसंघ का आधार मर्यादा पत्र का वाचन करते हुए कहा आचार्य भिक्षु ने जब मर्यादाओं का सृजन किया तब इस महोत्सव का समायोज न नहीं होता था यह श्रीमद जयाचार्य की सुझबुझ की परिणति है। मुनि ने मर्यादा पत्र का वाचन करते हुए कहा- यह मर्यादा पत्र नहीं तेरापंथ धर्म संघ का सुरक्षा छत्र है। मुनि ने इस अवसर पर तेरापंथ शासन पाया रे भाग्य बड़े बलवान गीत प्रस्तुत किया ।
मुनि मुनिसुव्रत कुमार ने कहा- तेरापंथ धर्मसंध जैसा पुण्यशाली धर्मसंध पाकर कौन अपने सौभाग्य की सराहना नहीं करेगा। मुनि ने "भिक्षु शासन की महिमा अपार हैं। सुमधुर गीत का संगान करते हुए कहा- जो मर्यादा का शुद्ध पालन करता है वह सृष्टि के लिए पुज्य हो जाता है।
बहुश्रुत परिषद् सदस्य व ज्ञानशाला आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि उदित कुमार ने कहा- दीक्षीत होने के बाद जीवन भर मानसिक व शारिरीक तौर पर निश्चिंत करना ही तेरापंथ धर्मसंघ की मिसाल है। अनुशासन, समर्पण का यह उत्सत केवल तेरापंथ में ही हो सकता है।मुनि ने सेवा के विभिन्न आयामों पर विश्लेषण किया।
साध्वी सम्यकप्रभा ने कहा-तेरापंथ धर्मसंघ की तेजस्विता का आधार है अनुशासन । बहुत सहज है औरो पर अनुशासन करना किन्तु जो स्वयं पर शासन करना सीख ले वही नायक है।
मुनिवृंद की और से मुनि सम्बोध कुमार 'मेधांश' मुनि मंगल प्रकाश, मुनि रम्य कुमार, मुनि ज्योतिर्मय, मुनि शुभम कुमार, मुनि सिद्धप्रज्ञ ने समुहगान, साध्वी वृंद की ओर से साध्वी सौम्यप्रभा, साध्वी मलय प्रभा, साध्वी दीक्षीत प्रभा ने समुहगान से मर्यादा की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम में ट्राइबल विभाग निदेशक ओ. पी. जैन ने श्रावक निष्ठा व पत्र का वांचन करते हुए श्रावक समाज को संघीय निष्ठा की शपथ दिलाइ । इस अवसर पर तेरापंथ महिला मंडल व तेरापंथ युवक परिषद् ने समूह गान की प्रस्तुति दी तेरापंथ सभा अध्यक्ष कमल नाहटा, सभा मंत्री अभिषेक पोखरणा , ते. यु.प अध्यक्ष भुपेश खमेसरा, महिला मंडल अध्यक्षा सीमा बाबेल ने भावपूर्ण विचारो की अभिव्यक्ति दी। आभार सभा उपाध्यक्ष आलोक पगारिया ने किया। मंच संचालन मुनि सम्बोध कुमार 'मेधांश' ने किया। कार्यक्रम का समापन संघ गान व मुनि सुरेश कुमार के मंगलपाठ से हुआ।
आज्ञा, मर्यादा, आचार्य, गण और धर्म में समाहित है मर्यादा महोत्सव का सार : आचार्य महाश्रमण
161वें मर्यादा महोत्सव का दूसरा दिवस
आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के पट्टोत्सव पर आचार्यश्री ने किया श्रद्धा स्मरण
मुख्यमुनिश्री ने जनता को किया उद्बोधित
भुज की धरा पर प्रारम्भ हुआ मर्यादा का महाकुम्भ ‘161वां मर्यादा महोत्सव’गुजरात का प्रथम मर्यादा महोत्सव भुज के स्मृतिवन में हुआ समायोजितसेवाकेन्द्रों पर आचार्यश्री ने की नियुक्तियां, सेवा को समर्पित रहा प्रथम दिवसचतुर्विध धर्मसंघ में बनी रहे आध्यात्मिक सेवा भावना : तेरापंथाधिशास्ता महाश्रमणअनेक कृतियां व जयतिथि पत्रक आचार्यश्री के समक्ष हुए लोकार्पित
करीब चार घंटे तक चलता रहा मर्यादा महोत्सव का कार्यक्रम
श्रद्धा, भक्ति एवं समर्पण के त्रिवेणी संगम स्वरूप तेरापंथ के महाकुंभ का
कच्छ (गुजरात) की धरा पर हुआ भव्य आग़ाज़
मर्यादा के शिखर पुरुष आचार्य श्री महाश्रमणजी के मुखारविंद से नमस्कार महामंत्रोच्चार से त्रिदिवसीय मर्यादा महोत्सव का हुआ प्रारंभ
पूज्य गुरुदेव युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आचार्य श्री भिक्षु एवं श्रीमद् जयाचार्य का स्मरण करते हुए 161 वें मर्यादा महोत्सव के प्रारम्भ की घोषणा करते हुए ऐतिहासिक मर्यादा पत्र की स्थापना की
सूर्य का प्रकाश कहूँ या चन्द्रमा की शीतलता कहूँ ,
करुणा की झील कहूँ या ज्ञान का सागर कहूँ !
कोमल की मधुरता कहूँ या शहद की मिठास कहूँ ,
तारा कहूँ या ध्रुव तारा कहूँ , निर्मल कहूँ या निर्मलता कहूँ !
मां की ममता कहूँ या पिता का प्यार कहूँ ,
भाई का कर्तव्य कहूँ या वात्सल्य का झरना कहूँ !
कोमल की मधुरता कहूँ या शहद की मिठास कहूँ !
विद्यालय कहूँ या विश्वविद्यालय कहूँ ,
आलय कहूँ या आत्म हिमालय कहूँ !
अनुकम्पा का प्रसाद कहूँ या प्रभु का आशीर्वाद कहूँ !
दिव्यता कहूँ या भव्यता कहूँ , सुंदरता कहूँ या आत्म सुंदरता कहूँ !
नम्रता कहूँ या विनम्रता कहूँ समता कहूँ या सरलता कहूँ !
नोट कहूँ या नोटों का बैंक कहूँ , कुछ कहे तो आध्यात्मिक एटीएम कहूँ !
तपस्वी कहूँ या महातपस्वी कहूँ , यशस्वी कहूँ या महायशस्वी कहूँ !
उज्ज्वलता का आकाश कहूँ या संकल्पों की बरसात कहूँ !
जल कहूँ या जल की तरंग कहूँ ,
कुछ कहूँ तो जीवन की उमंग कहूँ !
ज्योति कहूँ या ज्वाला कहूँ ,
कुछ कहूँ तो दिव्य उजाला कहूँ !
मान कहूँ या आत्म सम्मान कहूँ !
मैं तो तुलसी महाप्रज्ञ का हनुमान कहूँ
सत्य कहूँ या शाश्वत कहूँ , समझ में नहीं आता है, मैं क्या कहूँ !
अगर कुछ कहूँ तो शाश्वत ज्ञाता दृष्टा कहूँ !
पुष्प कहूँ या हृदय का हार कहूँ !
अगर कुछ कहूँ तो जगत का पालनहार कहूँ !
विशेषण कम विशेषताएं अनेक हैं, शब्द कम उपमाएं अनेक हैं !
हे महाश्रमण ! तुझे मैं क्या कहूँ ,
अगर कुछ कहूँ तो ये ही कहूँ
मेरे हृदय की सांस कहूँ ,
तुलसी , महाप्रज्ञ और तीर्थंकर
का साक्षात कहूँ !
हे नेमा नंदन, झूमर वंदन मेरे महाश्रमण तुझे प्रणाम !!!!
- हेमन्त छाजेड़
*📜 मर्यादा के शिखर पुरुष युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी के सानिध्य में तेरापंथ के महाकुंभ "160 वें मर्यादा महोत्सव" का वाशी - नवी मुम्बई में हो रहा है आयोजन*
*📿 पूज्य प्रवर द्वारा नमस्कार महामन्त्र के समुच्चारण के साथ तृतीय दिवस के कार्यक्रम का हुआ शुभारम्भ*
*🌀 पूज्य प्रवर द्वारा खड़े होकर गुरुदेव तुलसी द्वारा विरचित "भीखण जी स्वामी भारी मर्यादा बांधी संघ" में गीत का हुआ संगान*
*📜 मर्यादा के शिखर पुरुष युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी के सानिध्य में तेरापंथ के महाकुंभ "160 वें मर्यादा महोत्सव" का वाशी - नवी मुम्बई में हो रहा है आयोजन*
*📿 तृतीय दिवस का कार्यक्रम*
*🌀 समणी वृन्द द्वारा गीत संगान*
*सारी धरती पर बिछी अंशुमाला*
*मिला है पन्थ भिक्षुवाला*