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शनिवार, फ़रवरी 18, 2023

प्रार्थना


एक बार एक पिता और उसका पुत्र जलमार्ग से कहीं यात्रा कर रहे थे और तभी अचानक दोनों रास्ता भटक गये। फिर उनकी नौका भी उन्हें ऐसी जगह ले गई, जहाँ दो टापू आस-पास थे और फिर वहाँ पहुंच कर उनकी नौका टूट गई। पिता ने पुत्र से कहा, अब लगता है, हम दोनों का अंतिम समय आ गया है, दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिख रहा है।

अचानक पिता को एक उपाय सूझा, अपने पुत्र से कहा कि वैसे भी हमारा अंतिम समय नज़दीक है, तो क्यों न हम ईश्वर की प्रार्थना करें। उन्होने दोनों टापू आपस में बाँट लिए।

एक पर पिता और एक पर पुत्र, और दोनों अलग-अलग टापू पर ईश्वर की प्रार्थना करने लगे।

पुत्र ने ईश्वर से कहा, हे भगवन, इस टापू पर पेड़-पौधे उग जाए जिसके फल-फूल से हम अपनी भूख मिटा सकें। ईश्वर ने प्रार्थना सुनी गयी, तत्काल पेड़-पौधे उग गये और उसमें फल-फूल भी आ गये। उसने कहा ये तो चमत्कार हो गया। फिर उसने प्रार्थना की, एक सुंदर स्त्री आ जाए जिससे हम यहाँ उसके साथ रहकर अपना परिवार बसाएँ। तत्काल एक सुंदर स्त्री प्रकट हो गयी। अब उसने सोचा कि मेरी हर प्रार्थना सुनी जा रही है, तो क्यों न मैं ईश्वर से यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता माँगे लूँ ? उसने ऐसा ही किया उसने प्रार्थना की, एक नई नाव आ जाए जिसमें सवार होकर मैं यहाँ से बाहर निकल सकूँ। तत्काल नाव प्रकट हुई और पुत्र उसमें सवार होकर बाहर निकलने लगा।

तभी एक आकाशवाणी हुई, बेटा तुम अकेले जा रहे हो? अपने पिता को साथ नहीं लोगे ? पुत्र ने कहा, उनको छोड़ो, प्रार्थना तो उन्होंने भी की, लेकिन आपने उनकी एक भी नहीं सुनी।  शायद उनका मन पवित्र नहीं है, तो उन्हें इसका फल भोगने दो ना ? आकाशवाणी ने कहा, क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता ने क्या प्रार्थना की ? पुत्र बोला, नहीं !आकाशवाणी बोली तो सुनो, तुम्हारे पिता ने एक ही प्रार्थना की... हे भगवन। मेरा पुत्र आपसे जो भी माँगे, उसे दे देना क्योंकि मैं उसे दुःख में हरगिज़ नहीं देख सकता औऱ अगर मरने की बारी आए तो मेरी मौत पहले हो और जो कुछ तुम्हें मिल रहा है उन्हीं की प्रार्थना का परिणाम है। पुत्र बहुत शर्मिंदा हो गया।

हमें जो भी सुख, प्रसिद्धि, मान, यश, धन, संपत्ति और सुविधाएं मिल रही है उसके पीछे किसी अपने की प्रार्थना और शक्ति जरूर होती है लेकिन हम नादान रहकर अपने अभिमान वश इस सबको अपनी उपलब्धि मानने की भूल करते रहते हैं और जब ज्ञान होता है तो असलियत का पता लगने पर सिर्फ़ पछताना पड़ता है। हम चाह कर भी अपने माता पिता का ऋण नहीं चुका सकते। यह याद रखो उस परमपिता को जिसने पूरी सृष्टि रचाई है।  कभी अभिमान नहीं करना चाहिए, हम किसके भाग्य का पा रहे हैं, कोई बोल नही सकता।


Once a father and his son were traveling somewhere by a waterway and then suddenly both lost their way.  Then his boat also took him to a place where two islands were nearby and then his boat broke down after reaching there.  The father said to the son, now it seems, the last time has come for both of us, no support is visible far and wide.


 Suddenly the father thought of a solution, told his son that anyway our last time is near, so why not pray to God.  They divided both the islands among themselves.


 Father on one and son on the other, and both started praying to God on different islands.


 The son said to God, O God, let trees and plants grow on this island, with whose fruits and flowers we can satisfy our hunger.  God heard the prayer, immediately trees and plants grew and fruits and flowers also came in it.  He said that this is a miracle.  Then he prayed, a beautiful woman should come so that we can stay here with her and settle our family.  Immediately a beautiful woman appeared.  Now he thought that my every prayer is being heard, so why don't I ask God for a way out of here?  He did so and prayed that a new boat should come in which I could get out of here.  Immediately the boat appeared and the son started coming out riding in it.

Only then there was an Akashvani, son, you are going alone?  Won't you take your father with you?  Son said, leave them, they also prayed, but you didn't listen to them.  Maybe their mind is not pure, so let them suffer the consequences, right?  Akashvani said, do you know what your father prayed?  The son said, no! Listen to what Akashvani said, your father made only one prayer... O God.  Whatever my son asks from you, give him because I can never see him in sorrow and if it is his turn to die, I should die first and whatever you are getting is the result of his prayers.  The son became very embarrassed.


 Whatever happiness, fame, respect, fame, wealth, wealth and facilities we are getting, behind it there is certainly the prayer and power of someone close to us, but being ignorant, due to our pride, we keep making the mistake of considering all this as our achievement and when knowledge  If it happens, then only you have to repent after finding out the reality.  We cannot repay the debt of our parents even if we want to.  Remember this Supreme Father who created the whole world.  One should never be proud, whose fortune we are getting, no one can say.



साभार  : जैन कार्यवाहिनी कोलकाता के व्हाट्सएप्प ग्रुप में श्री महेंद्र दुगड़ द्वारा अग्रेषित

शनिवार, जनवरी 21, 2023

सुविचार


"कहते हैं कि मुसीबत कभी अकेले नहीं आती, उसके बाल-बच्चे भी साथ होते हैं । अभी एक कठिनाई से छूटे नहीं कि दूसरी आ धमकी। जीवन एक संग्राम है । इसे कायरों को भी लड़ना पड़ता है, शूरवीरों को भी । कठिनाइयां, दुःख, मुसीबतें ऐसे ही शत्रु हैं, जिनसे हमें लड़ना ही पड़ेगा । इनसे पीछा छुड़ाना असंभव है, फिर इन्हें साहस के साथ क्यों न ललकारें ? क्यों न वीर योद्धाओं के समान इनसे जूझें ? जीवन-संग्राम में वही विजय पाता है, जो कठिनाइयों से रक्त की अंतिम बूंद रहने तक, जीवन की अंतिम सांस तक लड़ता है । जीवन का श्रेय भी इसी में है कि मुसीबतों में घबराएं नहीं, उनके साथ संघर्ष करें ।"


साभार ; श्री गजेंद्र नाहटा (Whatsapp ग्रुप के माध्यम से)

मंगलवार, दिसंबर 20, 2022

भौतिकता पर रहे आध्यात्मिकता का अंकुश : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

 


20.12.2022, मंगलवार, कुड़ी, जोधपुर (राजस्थान), जनकल्याण के लिए गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना संग सोमवार को प्रातः की मंगल बेला में कांकाणी से मंगल प्रस्थान किया। आचार्यश्री लगभग सोलह किलोमीटर का प्रलम्ब विहार कर कुड़ी स्थित जिनेट प्रा. लि. में पधारे तो जोधपुर के श्रद्धालुओं व जिनेट आफिस के कार्यकर्ताओं ने आचार्यश्री का भावभीना स्वागत अभिनंदन किया। आचार्यश्री ने जिनेट के परिसर में श्रद्धालुओं को पावन पाथेय प्रदान कर अल्पकालीन प्रवास पुनः भक्तों की भावनाओं को देखते हुए सान्ध्यकालीन विहार किया। आचार्यश्री श्रद्धालुओं पर आशीषवृष्टि करते हुए लगभग छह किलोमीटर का सान्ध्यकालीन विहार कर कुड़ी भक्तासिनी हाउसिंग बोर्ड के सेक्टर नम्बर दो में स्थित श्री मर्यादा कोठारी के निवास स्थान में पधारे। जहां नगरवासियों ने आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन किया। आचार्यश्री का रात्रिकालीन प्रवास यहीं हुआ। श्रद्धालुओं की भावनाओं को स्वीकार करते हुए अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने एक दिन में कुल लगभग 22 किलोमीटर का विहार किया। 


जिनेट में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में आचार्यश्री ने उपस्थित जनता को अपनी अमृतवाणी से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ ने एक ही जन्म में भौतिक जगत के सबसे सर्वोच्च पद चक्रवर्ती को भी प्राप्त किया और भौतिक जगत का परित्याग किया तो अध्यात्म जगत के सर्वोच्च पद तीर्थंकर पद को भी प्राप्त कर लिया। अध्यात्म के समक्ष भौतिकता की बात बौनी-सी बात होती है। गृहस्थ के पास संपदा का भण्डार हो सकता है, किन्तु संयम रत्न के समक्ष उसकी समस्त सम्पदाएं मानों तुक्ष-से होते हैं। धन तो इसी जीवन में उपयोेग में आ सकता है, किन्तु संयम रूपी रत्न आगे भी काम आ सकता है। 


गृहस्थों को भौतिक संपदाओं के विकास पर अध्यात्मिकता का अंकुश लगाए रखने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ जीवन को चलाने के लिए भौतिक विकास की आवश्यकता होती है, किन्तु संपदा के अर्जन में नैतिकता, प्रमाणिकता रहे, तो संपदा के अर्जन में अध्यात्म का अंकुश रह सकता है। अर्थाजन में अहिंसा, संयम और प्रमाणिकता रहे तो शुद्धता की बात हो सकती है। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन से पूर्व साध्वीप्रमुखाजी ने भी जनता को अभिप्रेरित किया। 


आचार्यश्री के आगमन से हर्षित जिनेट के ऑनर श्री सुरेन्द्र पटावरी (बेल्जीयम) व श्री संदीप पटावरी ने अपनी आस्थासिक्त अभिव्यक्ति दी। जिनेट ऑफिस की महिला टीम व राकेश सुराणा के नेतृत्व में पुरुष टीम ने स्वागत गीत का संगान किया। सुश्री खुशी चौपड़ा व श्रीमती मनोनिका चोरड़िया ने भी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। ऑफिस के सदस्यों ने आचार्यश्री से कार्यालय समय के दौरान आधा घण्टा तक मोबाइल का यूज न करने का संकल्प स्वीकार किया। 


प्रलम्ब विहार, मंगल प्रवचन के बाद भी भक्तों की भावनाओं को स्वीकार करते हुए अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अल्पसमय का विश्राम कर पुनः सान्ध्यकालीन विहार को गतिमान हुए। आचार्यश्री के दर्शन को उमड़े श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति से अनायास ही भव्य जुलूस-सा दृश्य उपस्थित हो गया। आचार्यश्री लगभग छह किलोमीटर का विहार कर कुड़ी भक्तासिनी हाउसिंग बोर्ड के सेक्टर दो में स्थित कोठारी परिवार के निवास स्थान में पधारे, जहां आचार्यश्री का रात्रिकालीन प्रवास हुआ। 


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मंगलवार, जनवरी 04, 2022

आत्मा की शुद्धि के लिए ऋजुता आवश्यक - आचार्य महाश्रमण

 

04.01.2022, मंगलवार, बोराज, जयपुर (राजस्थान), जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शान्तिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी राजस्थान की रेतीली धरती पर ज्ञान की गंगा बहाते हुए निरंतर गतिमान हैं। इस निर्मल गंगा से अब तक राजस्थान के भीलवाड़ा, कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर, चित्तौड़गढ़ जिले के साथ राजस्थान की राजधानी जयपुर भी पावनता को प्राप्त हो चुकी है। ग्यारह दिवसीय संघ प्रभावक जयपुर प्रवास के उपरान्त आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ जयपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में गतिमान हैं। मंगलवार को आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी अहिंसा यात्रा के साथ देहमी कलां स्थित मणिपाल विश्वविद्यालय से मंगल प्रस्थान किया। ठंड के मौसम में जहां लोग गर्म कपड़ों से ढंके होने के बावजूद भी बाहर निकलने पर आग का सहारा लेते दिखाई दे रहे थे वहीं मानवीय मूल्यों की स्थापना को और जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति का संदेश देने के लिए महातपस्वी महाश्रमण गतिमान थे। रास्ते में अनेकानेक लोगों को अपने दर्शन और आशीर्वाद से पावन बनाते आचार्यश्री लगभग चौदह किलोमीटर का विहार कर बोराज गांव में पधारे। ग्राम्यजनों तथा राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्रिंसिपल, शिक्षक व विद्यार्थियों ने आचार्यश्री भव्य स्वागत किया। 

 विद्यालय परिसर के एक कमरे से आचार्यश्री ने वर्चुअल रूप में आयोजित प्रातःकाल के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि एक प्रश्न हो सकता है कि निर्वाण को कौन प्राप्त कर सकता है? निर्वाण का अर्थ मोक्ष भी हो सकता है, किन्तु कभी-कभी एकार्थक शब्दों में गहराई में जाने पर कुछ सूक्ष्म भिन्नता भी प्राप्त हो सकता है। निर्वाण प्राप्ति की बात की जाए तो जिस आदमी के भीतर धर्म हो अर्थात् धर्मवान मनुष्य निर्वाण को प्राप्त हो सकता है। एक प्रश्न और हो सकता है कि धर्मवान कौन होता है अथवा धर्म किस आदमी के भीतर हो सकता है तो उसका उत्तर यह होगा कि जिस आदमी की आत्मा शुद्ध हो व धर्मवान होता है। पुनः एक प्रश्न हो सकता है आत्मा शुद्ध कैसे हो? इसका उत्तर होगा कि जो आदमी ऋजु अर्थात् सरल होता है, उसकी आत्मा शुद्ध होती है। आत्मा की शुद्धि के लिए आदमी के भीतर संयम, दया, शील, सत्य आदि की भावना हो तो आत्मशुद्धि की बात हो सकती है। जिस आदमी के भीतर छल-कपट हो, उसकी आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती। 


सोमवार, दिसंबर 06, 2021

राग-द्वेष पाप का आधार है - आचार्य महाश्रमण

पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल संग सैंकड़ों लोगों ने स्वीकार किए संकल्प, प्राप्त किया आशीर्वाद


06.12.2021, सोमवार, कापरेन स्टेशन, बूंदी (राजस्थान), मानव-मानव को मानवता का संदेश देते हुए जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शान्तिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ जिस ओर भी निकलते हैं, जन-जन उनकी अभिवंदना में जुट जाता है। आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सोमवार को प्रातः की मंगल बेला में अरनेठा ने मंगल प्रस्थान किया तो स्थानीय ग्रामीणों ने हाथ जोड़कर वंदना की तो आचार्यश्री ने उन्हें पावन आशीर्वाद प्रदान किया। रास्ते में आने वाले क्या बच्चे और क्या बुजुर्ग और क्या नौजवान जो भी अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री को देख नतमस्तक होकर आचार्यश्री की अभिवंदना करता तो आचार्यश्री भी सभी पर समान रूप से आशीषवृष्टि करते हुए गंतव्य की ओर गतिमान थे। लगभग 15 किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री कापरेन स्टेशन गांव पहुंचे तो लोगों ने ढोल-नगाड़ों के साथ आचार्यश्री का भव्य स्वागत किया। आचार्यश्री कापरेन स्टेशन स्थित राजकीय माध्यमिक विद्यालय प्रांगण में पधारे। 


 विद्यालय प्रांगण में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आचार्यश्री ने समुपस्थित श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी जो भी पाप करता है उसके पृष्ठभूमि में राग और द्वेष होते हैं। दुनिया में आदमी जो भी कार्य करता है उसके जड़ में राग और द्वेष ही होते हैं। इसलिए राग और द्वेष को कर्मों का बीज भी कहा जाता है। अगर राग-द्वेष न हो तो आदमी कोई पाप ही न करे। आदमी किसी को मारे, किसी से झगड़ा करे, झूठ बोले, कोई अनैतिक कार्य करे, वह या तो राग के वशीभूत होकर करता है अथवा द्वेष की भावना से करता है। यदि आदमी के भीतर राग-द्वेष की न्यूनता हो जाए अथवा राग-द्वेष की भावना समाप्त हो जाए तो आदमी धर्मानुरागी बन सकता है। राग-द्वेष पाप का आधार है। आदमी को ध्यान, स्वाध्याय, जप और अन्य धर्माचरणों के माध्यम से राग-द्वेष को न्यून अथवा प्रतनु बनाने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को राग-द्वेष को कम कर पापों से बचते हुए धर्माचरण करने का प्रयास करना चाहिए। 


 मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के उपरान्त पूर्व विधायक श्री प्रहलाद गुंजल व स्थानीय नेता रूपेश शर्मा के नेतृत्व में कापरेन, अजन्दा, जालीजिका बराना, कोडकिया, शिरपुरा, माइजा, रोटेदा, रड़ी व अरनेठा के सैंकड़ों लोग आचार्यश्री के दर्शनार्थ और पावन प्रेरणा के लिए उपस्थित हुए। इस तरह मानों आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अनायास एक कार्यक्रम-सा आयोजित हो गया। आचार्यश्री ने उपस्थित लोगों को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि 84 लाख जीव योनियों में यह मानव जीवन दुर्लभ है। पशु और मानव में धर्म का ही अंतर होता है। जो मनुष्य धर्महीन हो जाए, वह पशु के समान हो जाता है। सभी के जीवन में धार्मिकता का विकास हो। आचार्यश्री ने जैन धर्म, साधुचर्या, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ, आचार्य परंपरा व अहिंसा यात्रा की अवगति प्रदान करते हुए कहा कि सभी के प्रति सद्भावना हो। किसी से वैर-विरोध नहीं होना चाहिए। आदमी जो भी काम करे, उसमें नैतिकता, प्रमाणिकता बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। नशामुक्त जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए और वर्तमान जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री के आह्वान पर समुपस्थित पूर्व विधायक गुंजल सहित सैंकड़ों लोगों ने करबद्ध खड़े होकर आचार्यश्री से अहिंसा यात्रा के तीनों संकल्पों को स्वीकार किया और आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। 

            इसके पूर्व अहिंसा यात्रा प्रवक्ता मुनिकुमारश्रमणजी ने अहिंसा यात्रा की अवगति प्रस्तुत की। पूर्व विधायक ने आचार्यश्री की अभिवंदना में अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए कहा कि यह हम सभी का परम सौभाग्य है जो आचार्यश्री महाश्रमणजी जैसे महापुरुष के दर्शन करने, उनकी मंगल कल्याणकारी वाणी को सुनने और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने का सुअवसर मिला है। मानवता की सेवा की लिए आप जो कठोर श्रम करा रहे हैं वे अद्वितीय हैं, इससे जन-जन का कल्याण हो रहा है। आपकी प्रेरणा और आशीर्वाद से हम सभी का जीवन धन्य हो गया। 


साभार : महासभा केम्प ऑफिस

The basis of sinful deeds is anger and hatred: Acharya Mahashraman

Hundreds of people with former MLA Prahlad Gunjal accepted the resolution of non violence journey and received blessings 


06.12.2021, Monday, Kapren Station, Bundi (Rajasthan), Giving the message of humanity to human beings, the Jain Shvetambara Terapanth Dharmasangh Ekadashmadhishasta, the pioneer of non-violence journey, the shantidoot Acharyashree Mahashramanji, with his Dhaval army, wherever he goes, people get involved in his greetings. Acharyashree Mahashramanji on Monday morning at Mangal Bela, Arnetha departed for Mars, then the local villagers prayed with folded hands and Acharyashree blessed him with holy blessings. Whether the children coming on the way, the elderly and the young, whoever bowed down  on seeing the Akhand Parivrajak Acharya Shree.Acharya Shree was also moving towards the destination, showering blessings on everyone equally. When Acharyashree reached Kapren station village after visiting about 15 kms, people gave a grand welcome to Acharyashree with drums. Acharyashree came to the Government Secondary School premises located at Kapren station. 


In the main Mangal discourse program organized in the school premises, Acharyashree while providing holy inspiration to the devotees said that whatever sin a man commits, there is anger and hatred in the background. Whatever work a man does in the world is rooted in anger and hatred. That is why anger and aversion are also called seeds of actions. If there is no attachment or aversion, then a person should not commit any sin. A man kills someone, quarrels with someone, tells a lie, does some immoral act, he does it either out of passion or out of hatred. If there is a minimum of attachment and aversion within a person or the feeling of attachment and aversion ends, then a man can become a devotee of religion. Anger and hatred are the basis of sin. One should try to reduce anger and aversion through meditation, self-study, chanting and other religious practices. One should try to practice righteousness by reducing attachment and aversion and avoiding sins. 


After the main Mangal discourse program, under the leadership of former MLA Shri Prahlad Gunjal and local leader Rupesh Sharma, hundreds of people from Kapren, Ajanda, Jaljika Barana, Kodakia, Shirpura, Maija, Roteda, Radi and Arnetha appeared for Acharyashri's darshan and holy inspiration. In this way, it was as if a program was organized spontaneously in the Mangal Sannidhi of Acharyashree. Acharyashree while providing sacred inspiration to the people said that this human life is rare among 84 lakh creatures. Religion is the only difference between animal and human. A man who becomes religionless, he becomes like an animal.So there be development of righteousness in everyone's life. Giving information about Jainism, Sadhucharya, Jain Shwetambar Terapanth Dharmasangh, Acharya tradition and non-violence journey, Acharyashree said that there should be goodwill towards all. There should be no conflict with anyone. In whatever work a man does, one should try to maintain morality, authenticity. One should try to lead a drug free life and try to make the present life good. On the call of Acharyashree, hundreds of people including former MLA Gunjal, who were present, accepted all the three resolutions of non-violence journey from Acharyashree and got blessings from him too.

Earlier, non-violence yatra spokesperson Muni Kumarshramanji presented the information about non-violence yatra. The former MLA, while giving his expression in the obeisance of Acharyashree, said that-"it is the utmost good fortune of all of us who have got the opportunity to see a great man like Acharyashree Mahashramanji, listen to his auspicious voice and get blessings from him. The hard work you are doing for the service of humanity is unique, it is benefiting the people. All our lives have become blessed with your inspiration and blessings."


Broadcaster : Jain Shwetambar Terapanth Mahasabha

रविवार, दिसंबर 05, 2021

Human should try to come out from the ocean of the world through religious practice - Acharya Mahashraman

With the inspiration of Acharya Shri, the villagers accepted the resolution of non-violence journey

 

05.12.2021, Sunday, Arnetha, Bundi (Rajasthan), The non-violence journey of Acharya Mahashraman which inspires humanity to human beings, awakens goodwill, morality and de-addiction among people, is currently moving in the border of Bundi district. Ahimsa Yatra under the able leadership of Acharya Shree Mahashramanji, the eleventh disciple of Jain Shwetambar Terapanth Dharmasangh, is awakening the spirit of humanity in the new village of Bundi district. On Sunday, Mahatapasvi Acharyashree Mahashramanji, along with his non-violence journey, performed Mangal Vihar from Gamach village in the early morning hours. On the way, villagers of many villages were benefited by the darshan and blessings of Acharya Shree. Distributing blessings to everyone, motivating the people, Acharyashree visited the Government Higher Secondary School located in Arnetha village after traveling for about 16 kms, then the entire Arnetha including this school was attained to the holiness. Despite the school being a holiday on Sunday, today the whole school was full of local villagers and devotees. The villagers and the people associated with the school warmly welcomed and greeted Acharyashree. 


After midday, Acharyashree gave holy inspiration to the people of Arnetha with his auspiciousness and said that the human body is like a boat, the soul is its sailor and this world is like the ocean. Tyagi saints and Maharishi people submerge this world ocean. The householder can also try to float this ocean of the world through religious practice. If there is a body, then while doing spiritual practice with it, one should try to get absorbed. There may also be a tear-shaped hole in the boat of the body. Violence, theft, lies, anger, greed, etc. are those holes in the form of tears which fill the water of sin in the boat of human life, due to which this boat keeps sinking in the ocean of the world. Eighteen sins are mentioned in Jainism. One should try to make the boat of this body free from sinful activities. Efforts should be made to increase religion in one's life through the speech of saints, meditation of God, listening to his story etc. If the householders are good, virtues are developed in them, righteousness is developed in life, then this life can become one who can cross the ocean of the world and go on the path of welfare. 

After the Mangal discourse, Acharyashree gave information about Jain Sadhucharya and Ahimsa Yatra to a large number of villagers and called upon them to accept the resolutions of Ahimsa Yatra, while the villagers stood up and accepted the resolutions. Acharyashree gave them special inspiration and holy blessings to be free from addictions. With the arrival of Acharyashree, the entire school campus and the surrounding area had become like a fair. The villagers continued to be present throughout the day for the darshan of Acharyashree. He continued to get the benefit of Acharyashree's darshan and blessings as per the condition throughout the day.


Credits: Mahasabha Camp Office

शुक्रवार, अगस्त 06, 2021

भीतर का "मैं" का मिटना ज़रूरी है...



सुकरात समुन्द्र तट पर टहल रहे थे| उनकी नजर तट पर खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी |

वो उसके पास गए और प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा , -''तुम क्यों रो रहे हो?''

लड़के ने कहा- 'ये जो मेरे हाथ में प्याला है मैं उसमें इस समुन्द्र को भरना चाहता हूँ पर यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं |''

बच्चे की बात सुनकर सुकरात विस्माद में चले गये और स्वयं रोने लगे |

अब पूछने की बारी बच्चे की थी |

बच्चा कहने लगा- आप भी मेरी तरह रोने लगे पर आपका प्याला कहाँ है?'


सुकरात ने जवाब दिया- बालक, तुम छोटे से प्याले में समुन्द्र भरना चाहते हो,और मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में सारे संसार की जानकारी भरना चाहता हूँ |


आज तुमने सिखा दिया कि समुन्द्र प्याले में नहीं समा सकता है , मैं व्यर्थ ही बेचैन रहा |''


यह सुनके बच्चे ने प्याले को दूर समुन्द्र में फेंक दिया और बोला- "सागर अगर तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता तो मेरा प्याला तो तुम्हारे में समा सकता है |"इतना सुनना था कि सुकरात बच्चे के पैरों में गिर पड़े और बोले-

"बहुत कीमती सूत्र हाथ में लगा है|


हे परमात्मा ! आप तो सारा का सारा मुझ में नहीं समा सकते हैं पर मैं तो सारा का सारा आपमें लीन हो सकता हूँ |"


ईश्वर की खोज में भटकते सुकरात को ज्ञान देना था तो भगवान उस बालक में समा गए |

सुकरात का सारा अभिमान ध्वस्त कराया | जिस सुकरात से मिलने के सम्राट समय लेते थे वह सुकरात एक बच्चे के चरणों में लोट गए थे |


ईश्वर जब आपको अपनी शरण में लेते हैं तब आपके अंदर का "मैं " सबसे पहले मिटता है |


या यूँ कहें....जब आपके अंदर का "मैं" मिटता है तभी ईश्वर की कृपा होती है |



साभार : टेलीग्राम लिंक👇🏻

https://t.me/joinchat/RD6z0BzLAXlkQdBaWCQhFQ


रविवार, जुलाई 18, 2021

लोकतंत्र में अगर कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन नहीं तो देश का विकास नहीं हो सकता - आचार्य महाश्रमण

 चातुर्मास हेतु शांतिदूत का ऐतिहासिक मंगल प्रवेश

भीलवाड़ा में तेरापंथ के आचार्य का प्रथम चातुर्मास

स्वागत में पहुंचे पंजाब के राज्यपाल सहित अनेक गणमान्य


18 जुलाई 2021, रविवार, तेरापंथ नगर, भीलवाड़ा, राजस्थान, तेरापंथ नगर आदित्य विहार, प्रातः 09 बज कर 21 मिनट पर जैसे ही शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी ने महाश्रमण सभागार में चातुर्मास हेतु मंगल प्रवेश किया पूरा वातावरण 'जय जय ज्योतिचरण - जय जय महाश्रमण' के जयघोषों से गुंजायमान हो उठा। हर ओर श्रद्धा-भक्ति का अनूठा दृश्य दिखाई दे रहा था। वस्त्र नगरी भीलवाड़ा में आचार्यश्री का यह चातुर्मास प्रवेश अनेक दृष्टियों से ऐतिहासिक रहा। भीलवाड़ा में तेरापंथ के आचार्यों का यह पहला चातुर्मास है। आचार्य श्री के साथ भी प्रथम बार 200 से अधिक साधु-साध्वियां चातुर्मास में है। देश- विदेश की हजारों किलोमीटर पदयात्रा संपन्न कर मेवाड़ पधारे गुरुवर के स्वागत में सभी में उत्साह-उमंग की नई लहर छाई हुई है।


प्रशासनिक दिशा-निर्देश एवं कोविद गाइडलाइन के मद्देनजर प्रवेश जुलूस का आयोजन नहीं रखा गया था। साधु-साध्वियों की धवल पंक्ति के मध्य आचार्य प्रवर को मंगल प्रवेश करता देख सभी श्रद्धानत थे। भीलवाड़ा वासियों का वर्षों पूर्व देखा गया स्वप्न आज साकार हो गया, ऐसा लग रहा था मानो भीलवाड़ा शहर महाश्रमणमय बन गया हो।


स्वागत समारोह में आचार्य प्रवर ने कहा- इस संसार में जब मंगल की बात आती है तो कई चीजों का नाम आ सकता है। कोई मुहूर्त आदि को मंगल मानता है, तो कहीं गुड़, नारियल आदि को भी मंगल माना जाता है, परंतु ये सब उत्कृष्ट मंगल नहीं है। धर्म ही उत्कृष्ट मंगल होता है। धर्म साथ में है तो फिर सदा मंगल है।अहिंसा, संयम, तप ये धर्म के लक्षण हैं। जीवन में अगर ये है, तो मानो धर्म है, अध्यात्म है। अहिंसा एक ऐसा तत्व है जो लोक में सबके लिए क्षेमंकरी है, कल्याणकारी है। आज समाज, राजनीति में भी अहिंसामय नीति होनी चाहिए। लोकतंत्र हो या राजतंत्र दोनों जनता की भलाई के लिए होते हैं। किसी भी समस्या का समाधान हिंसा से नहीं हो सकता। अहिंसा, प्रेम-मैत्री से भी समस्या सुलझाई जा सकती है।


गुरुदेव ने प्रेरणा देते हुए आगे कहा कि- इस भारत देश में धर्मनिरपेक्षता ही नहीं पंथनिरपेक्षता भी है। सबको अपनी रुचि अनुसार धर्म करने की छूट है। भारत एक आजाद देश है, आजादी के साथ संयम, अनुशासन का होना बहुत जरूरी है। लोकतंत्र में अगर कर्तव्यनिष्ठा, अनुशासन नहीं तो देश का विकास नहीं हो सकता। साथ ही सत्ता में निस्वार्थ सेवा रूपी तप भी होना चाहिए। सत्ता में आकर अगर जनता की सेवा ना करें तो वह व्यर्थता है। अहिंसा, संयम और तप रूपी धर्म जीवन में आ जाए तो व्यक्ति अपना जीवन सार्थक कर सकता है।


चातुर्मास प्रवेश पर गुरुदेव ने कहा कि- यह चातुर्मास का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। वर्षभर यात्रा के पश्चात ये चार महीने ऐसे होते हैं जब साधु को एक स्थान पर रहना होता है। आज चातुर्मास हेतु यहां प्रवेश हुआ है। कितने ही रत्नाधिक व छोटे साधु-साध्वियां वर्षों बाद इस बार साथ में है। यहां की जनता भी जितना हो सके उतना धर्म का लाभ उठाएं। यह चातुर्मास उपलब्धिकारक रहे, मंगलकामना।


साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभा जी ने उद्बोधन में कहा- आचार्यश्री एक महान यात्रा, विजय यात्रा कर यहां पधारे हैं। मेवाड़ के श्रावकों में विशिष्ट भक्ति है। चातुर्मास में सभी लक्ष्य बनाएं कि हमें गुरुवर की वाणी को आत्मसात कर जीवन में अपनाना है। यह सिर्फ भीलवाड़ा का ही नहीं पूरे मेवाड़ का चतुर्मास है।


स्वागत में पहुंचे पंजाब के राज्यपाल सहित अनेक गणमान्य

शांतिदूत के स्वागत में पंजाब के महामहिम राज्यपाल श्री वीपी सिंह बदनोर विशेष रूप से उपस्थित थे। इस अवसर पर सांसद श्री सुभाष बहेरिया, विधायक श्री रामलाल जाट, विधायक श्री विट्ठल शंकर अवस्थी, नगर परिषद चेयरमैन श्री राकेश पाठक, जिला कलेक्टर श्री शिव प्रकाश नकाते, जिला पुलिस अधीक्षक श्री विकास शर्मा, राइफल संघ के जिलाध्यक्ष श्री अभिजीत सिंह बदनोर, वरिष्ठ एडवोकेट उमेद सिंह राठौड़ आदि अनेक गणमान्य जनों ने भी आचार्य वर का अभिनंदन किया।


स्वागत करते हुए राज्यपाल श्री वीपी.सिंह बदनोर ने कहा- यह मेरा परम सौभाग्य है जो आज मेवाड़ की धरा पर मुझे आपका स्वागत करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। आप के प्रवचन हम सभी का मार्गदर्शन करने वाले हैं। मेरी विनती है पंजाब की धरा पर भी आप पधारे। इस चातुर्मास से पूरे देश में धर्म की ज्योति जलेगी।


कार्यक्रम में आचार्य महाश्रमण चातुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति अध्यक्ष श्री प्रकाश सुतरिया, स्वागताध्यक्ष श्री महेंद्र ओस्तवाल, वरिष्ठ श्रावक श्री नवरतन झाबक ने अपने विचार रखे। मंच संचालन मुनि दिनेश कुमार जी व व्यवस्था समिति के महामंत्री श्री निर्मल गोखरू ने किया।

सोमवार, मार्च 22, 2021

मार्च एन्डिंग में जांचे स्वयं के जीवन की बैलेंस शीट


इस मार्च एन्डिंग में जीवन की बैलेंस शीट जांचने की इच्छा हुई तो पाया कि प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, भाईचारा, कर्तव्यनिष्ठा के खाते ही गायब हैं।

मन के 'मुनीम' से पूछा तो वो बोला - सर  जी, वर्षो से इनके साथ कोई लेनदेन हुआ ही नहीं।।।
  
ना जाने कितने रिश्ते, ख़त्म कर दिये इस भ्रम ने कि मैं ही सही हूँ, और सिर्फ़ मैं ही सही हूँ...!!

हम सभी के साथ कही ना कही ऐसा हो रहा है। हम भी अपना बेलेंसशिट चेक करे कही हम मैं के खातिर हम को तो नहीं भूल रहें। मैं एक अंगुली जैसी होती है और हम मुट्ठी जैसी। एकता मुट्ठी में ही होती है। अब समय है रिश्तों को सुधारने का सबके साथ वैचारिक मतभेद दूर करने का, आपसी सम्बन्ध व्यवस्थित करने का क्योकि रिश्ते बनाते सालों बीत जाते है पर टूट एक पल में जाते है क्योकि दिल तो बच्चा है जी वैसे बच्चा सरल होने के साथ साथ चंचल भी होता है।

पंकज नाम में जल व कीचड़ का योग मिलता है और कहते है कीचड़ में रहते हुए भी वो कीचड़ से निर्लिप्त रहता है। हम आज विश्व जल दिवस के अवसर पर संकल्पित हो की हम द्वेष रूपी कीचड़ से ऊपर उठकर जल रूपी पवित्र जीवन जिए क्योकि जल है तो जीवन है वैसे ही पवित्रता है, विश्वास है, मधुरता है तो जीवन अमृतमय बन जाता है।

अग्रेषित Whatsapp सन्देश साथ मेरे भावों के समावेश पर अपनी प्रतिक्रिया जरुर दें - पंकज दुधोडिया

शुक्रवार, जनवरी 29, 2021

Kayotsarg means, "abandoning the body" - Acharya Mahapragya

All humans have strong attachments to material things, and in fact, to their body. Strong attachments are a significant obstacle in practicing meditation. Attachments can make it difficult to take even the first step of meditation, called Kayotsarg. Kayotsarg means, "abandoning the body". 


There is a technique very similar to kayotsarg in Hindu tradition of Hathyoga called shavaasan. There are simi|arities and differences between Hathyoga’s shavaasan and Jain tradition’s kayotsarg. Therefore, readers who have heard about shavaasan should not assume that kayotsarg and shavaasan are the same. In shavaasan one concentrates on relaxing the body, whereas in kayotsarg one not only makes the body relaxed but goes beyond the body to experience the separateness of body and soul and detachment from the body (mamatva visarjan).


 This is a profound realization of seeing the soul as different from the body, and is known by a technical term in Jain philosophy called bhed-vigyaan (Le. the science of differentiation between the soul and the body). To completely achieve the state of kayotsarg it is essential to use bhed vigyaan, the science of differentiation. 


~ Acharya Mahapragya


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साभार : Preksha Meditation